जलालुद्दीन रूमी: जुदाई से जन्मी मोहब्बत की शायरी
शम्स-ए-तबरेज़ी की जुदाई ने मौलाना रूमी को दुनिया का सबसे बड़ा प्रेम-कवि बना दिया। जानिए उनकी दास्तान, जो सात सौ साल बाद भी दिलों को छूती है।

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा
कहते हैं जुदाई इंसान को तोड़ देती है। एक बात कहूँ? मौलाना जलालुद्दीन रूमी के लिए, जुदाई ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े कवि में बदल दिया। एक ऐसा दर्द, जो अल्फ़ाज़ों में इतना ढला कि आज, सात सौ बरस बाद भी, दुनिया भर में उतना ही पढ़ा जाता है जितना अपने ज़माने में पढ़ा जाता था।
“गलत और सही के पार, एक मैदान है, मैं वहीं तुमसे मिलूँगा।“
मौलाना रूमी
ये सिर्फ़ एक शेर नहीं, ये रूमी की पूरी ज़िंदगी का निचोड़ है, एक ऐसी सोच जो हर मज़हब, हर सरहद, हर बहस से परे जाकर सिर्फ़ मोहब्बत की बात करती है।
तफ़्सीलात
| तफ़्सील | मालूमात |
|---|---|
| पूरा नाम | मौलाना जलालुद्दीन मुहम्मद रूमी (बल्ख़ी) |
| जन्म | 30 सितंबर 1207, बल्ख़ (आज का अफ़ग़ानिस्तान) |
| मृत्यु | 17 दिसंबर 1273, क़ोन्या (आज का तुर्की) |
| पेशा | सूफ़ी संत, इस्लामी विद्वान, फ़ारसी कवि |
| पहचान | मसनवी, दीवान-ए-शम्स-ए-तबरेज़ी के रचयिता |
| प्रेरणा | मेवलेवी सूफ़ी सिलसिला (व्हर्लिंग दरवेश) |
आग़ाज़: बल्ख़ से क़ोन्या तक का सफ़र
रूमी का जन्म 30 सितंबर 1207 को बल्ख़ में हुआ, जो आज के अफ़ग़ानिस्तान का हिस्सा है। उनके वालिद, बहाउद्दीन वलद, अपने ज़माने के मशहूर इस्लामी विद्वान थे, इतने मशहूर कि लोग उन्हें “सुल्तान-उल-उलेमा” यानी विद्वानों का सुल्तान कहा करते थे।
जब रूमी अभी बच्चे ही थे, चंगेज़ ख़ान की फ़ौजें मध्य एशिया की तरफ़ बढ़ रही थीं। ये सिर्फ़ एक जंग नहीं थी, ये एक तबाही थी जो पूरी तहज़ीबों को मिटा रही थी। बहाउद्दीन वलद अपने परिवार को लेकर वहाँ से निकल पड़े, दो हज़ार मील से भी ज़्यादा का सफ़र, निशापुर, बग़दाद, मक्का, दमिश्क़ से होते हुए, आख़िर 1228 में क़ोन्या में जाकर बसे, जो आज तुर्की का हिस्सा है।
1231 में बहाउद्दीन वलद का इंतक़ाल हो गया। रूमी ने उनकी जगह ली, मदरसे में पढ़ाना शुरू किया, इस्लामी फ़िक़्ह और धर्मशास्त्र के आलिम बन गए। उस वक़्त तक कोई नहीं जानता था कि यही सादा सा मौलवी, आगे चलकर दुनिया का सबसे बड़ा प्रेम-कवि बनेगा।
वो मुलाक़ात जिसने सब बदल दिया
30 नवंबर 1244। क़ोन्या की एक गली। रूमी अपने घोड़े पर सवार जा रहे थे, तभी एक फ़क़ीर सा दिखने वाला दरवेश उनके सामने आ खड़ा हुआ। नाम था शम्स-ए-तबरेज़ी। उसने रूमी से एक सवाल पूछा, इतना गहरा कि रूमी घोड़े से उतरकर उसके क़दमों में बैठ गए। उस दिन के बाद, दोनों लगभग अविभाज्य हो गए।
महीनों तक रूमी अपने शागिर्दों को, अपने परिवार को, सब कुछ भूलकर शम्स के साथ रहे। उनके मुरीद इससे नाराज़ हो गए, और आख़िर फ़रवरी 1246 में शम्स को क़ोन्या छोड़ना पड़ा। रूमी टूट गए। उनके बेटे सुल्तान वलद ने सीरिया जाकर शम्स को ढूँढ निकाला और वापस क़ोन्या ले आए। मगर ये ख़ुशी ज़्यादा दिन नहीं टिकी।
कहानी जारी है, अगले सफ़े पे