इस हफ़्ते के शेर: इंतज़ार, चाँद और जुदाई की दो लाइनें
इंतज़ार में उम्मीद, जुदाई में ख़ामोशी। इस हफ़्ते के पाँच शेर और उनके मतलब।

जुदाई एक लम्हे में हो जाती है, इंतज़ार बरसों चलता है। कोई चला जाता है तो पहले घर ख़ाली होता है, फिर घड़ी धीमी चलने लगती है, और फिर एक आदत बन जाती है: दरवाज़े की तरफ़ देखना, फ़ोन की हर घंटी पर चौंकना, शाम होते ही दहलीज़ पर एक दीया रख देना।
इंतज़ार में उम्मीद की गर्मी होती है और जुदाई में वक़्त की ठंडक। इन दोनों के बीच खड़ा इंसान बाहर से वही रहता है, मगर भीतर से बदल चुका होता है। शायर अपनी सबसे सच्ची लाइनें इसी सन्नाटे में लिखता है।
इस हफ़्ते के पाँच शेर इसी सन्नाटे के पाँच रंग हैं: दहलीज़ का दीया, जागता हुआ चाँद, वही रह गया शहर, लफ़्ज़ों में उतरी ख़ामोशी और वो वक़्त जो लौटना नहीं सिखाता। हर शेर के साथ उसका मतलब भी नीचे है।
इंतज़ार
वो आए नहीं, मगर इंतज़ार अब भी है,
दहलीज़ पर रोज़ एक दीया जलता है।
जब इंतज़ार आदत बन जाए, तब दीया रोज़ जलता है, चाहे आने वाला आए या न आए।
चाँद
चाँद ने पूछा शब से, ये कौन जागा है,
शब बोली, कोई मेरी तरह तन्हा है।
जागती रात में चाँद और शब की ये बातचीत असल में जागने वाले की अपनी तन्हाई का आईना है।
जुदाई
तुम गए तो शहर वही रहा,
बस मैं वो नहीं रहा।
गलियाँ वही, मकान वही, बदला तो सिर्फ़ वो जो पीछे रह गया। जुदाई किसी का जाना ही नहीं, ख़ुद का बदल जाना भी है।
ख़ामोशी
हर ख़ामोशी को मैंने लफ़्ज़ों में रख दिया,
अब पढ़ने वाला जाने, क्या कहा, क्या छुपाया।
जो बातें ज़बान तक नहीं पहुँचीं, वो शायरी में उतर आईं। अब उन्हें पढ़ने वाला अपने हिसाब से समझे।
वक़्त
वक़्त ने सब कुछ सिखा दिया,
बस लौटना नहीं सिखाया।
वक़्त हर सबक़ देता है, पर बीता हुआ पल दोबारा जीना किसी को नहीं सिखाता।
इन पाँचों में आपको कौन सा शेर सबसे ज़्यादा अपना लगा? कमेंट में ज़रूर बताइए। और शेर और नज़्में पढ़ने के लिए शायरी और नज़्म में आइए।