सफ़र-ए-इश्क़: एक अधूरे ख़त की दास्तान
एक पुरानी बोगी के आख़िरी सफ़र में, दो अजनबियों को मिलता है तीस साल पुराना एक अधूरा ख़त, और उसी के साथ शुरू होती है एक नई मोहब्बत की कहानी। पढ़िए।

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा
हर सफ़र की एक कहानी होती है, मगर कुछ सफ़र ऐसे होते हैं जो ख़ुद एक कहानी बन जाते हैं। ये कहानी है एक पुरानी रेलगाड़ी की आख़िरी रात की, एक भूले हुए ख़त की, और दो अजनबियों की, जो नफ़रत से शुरू होकर, उस मोहब्बत तक पहुँचे जिसे कहने की हिम्मत बरसों पहले किसी और ने खो दी थी।
“कुछ राज़ इंसान अपनी मर्ज़ी से नहीं छुपाते, वक़्त उन्हें किसी पुरानी लकड़ी की दराज़ में इस उम्मीद के साथ बंद कर देता है, कि शायद कोई सही हाथ, सही वक़्त पर, उन्हें ढूँढ ले।”
आख़िरी सफ़र
वो कोच रेलवे की उन गिनी-चुनी विरासती बोगियों में से एक थी, जो अब बहुत कम रूटों पर चलती थीं, लकड़ी के भारी पैनल, पीतल के पुराने हैंडल, और हर कोने में बरसों पुरानी एक अजीब, मगर सुकून देने वाली ख़ुशबू। कल सुबह इसी स्टेशन पर उतरने के बाद ये बोगी हमेशा के लिए वर्कशॉप भेज दी जाएगी, वहाँ इसे तोड़ा जाएगा, नए सिरे से बनाया जाएगा, और जो कुछ भी इसके पुराने वजूद का हिस्सा था, वो मिट जाएगा। ये उसका आख़िरी सफ़र था, अपने असली रूप में।
अलीना पिछले स्टेशन से चढ़ी थी। भीड़ इतनी थी कि उसे मुश्किल से अपनी सीट तक पहुँचने का रास्ता मिला, और कुली, जल्दी में, उसका सारा सामान बिना सोचे-समझे उसी की सीट पर लाद गया था, बैग के ऊपर बैग, हैंडबैग एक तरफ़ लटका हुआ। ट्रेन चलते ही अलीना उसी सामान को समेटने में जुट गई, एक-एक बैग उठाकर नीचे या साइड में सरकाती हुई।
ठीक इसी वक़्त, अगले स्टेशन पर रेहान चढ़ा। दरवाज़ा खोला, तो सामने का नज़ारा देखकर उसकी भवें चढ़ गईं, आधी सीट अब भी सामान से घिरी नज़र आई। उसने पूरी बात समझने की ज़हमत नहीं उठाई। “माफ़ करिएगा,” उसने कहा, आवाज़ में हल्की सी झुँझलाहट, “इतना सामान लेकर चलना ज़रूरी है क्या?”
अलीना का हाथ बैग पर ही रुक गया। “मैं इसे अभी समेट ही रही हूँ,” उसने कहा, तीखेपन से, “आपको दिख नहीं रहा?”
“मुझे तो बस इतना दिख रहा है कि मेरे बैठने की जगह नहीं है,” रेहान ने जवाब दिया, अब भी ये सोचे बिना कि शायद ग़लती उसकी अपनी जल्दबाज़ी की थी।
अलीना ने सीधा उसकी आँखों में देखा, जैसे किसी अजनबी से इतनी नाइंसाफ़ी की उम्मीद ही नहीं थी। उसने आख़िरी बैग भी उठाकर एक तरफ़ रख दिया, तेज़ी से, ग़ुस्से में। “अब ठीक है?” उसके लहजे में साफ़ था कि ये सफ़ाई है, माफ़ी नहीं। रेहान कुछ नहीं बोला, बस अपना बैग रखकर खिड़की की तरफ़ मुँह मोड़ लिया। अगले घंटे तक दोनों के बीच सिर्फ़ पहियों की खटर-पटर गूँजती रही, कोई एक लफ़्ज़ नहीं।
बीच-बीच में टीटी की आवाज़ें आतीं, चाय बेचने वाले की सीटी, किसी और डिब्बे से हँसी की गूँज, मगर उनके कूपे में एक ख़ामोशी छाई रही, जैसे दोनों ने आपस में एक अनकही जंग छेड़ रखी हो। स्टेशन के बाद स्टेशन गुज़रते गए, और रात गहरी होती गई।
एक पुरानी दराज़, एक भूला हुआ ख़त
कहानी जारी है, अगले सफ़े पे