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जलालुद्दीन रूमी: जुदाई से जन्मी मोहब्बत की शायरी

शम्स-ए-तबरेज़ी की जुदाई ने मौलाना रूमी को दुनिया का सबसे बड़ा प्रेम-कवि बना दिया। जानिए उनकी दास्तान, जो सात सौ साल बाद भी दिलों को छूती है।

जलालुद्दीन रूमी - विश्व के सबसे महान कवि

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा

1248 में शम्स एक रात अचानक ग़ायब हो गए, हमेशा के लिए। किसी को नहीं पता आज तक कि उनका क्या हुआ, कुछ इतिहासकार मानते हैं कि जलनशील मुरीदों ने ही उन्हें रास्ते से हटा दिया था। रूमी ने बरसों उन्हें ढूँढा, हर गली, हर शहर, हर चेहरे में शम्स को तलाशते रहे।

“जब किसी की तलाश में दिल टूटता है, तो उसी टूटन से अक्सर एक नई ज़बान जन्म लेती है, जिसे दुनिया शायरी कहती है।”

वो दर्द जो शायरी बन गया

रूमी ने पहले कभी शायरी नहीं लिखी थी। मगर शम्स की जुदाई ने उनके अंदर कुछ ऐसा तोड़ा कि चालीस हज़ार से भी ज़्यादा शेर उनकी ज़बान से फूट पड़े। ये सारे शेर मिलकर बने “दीवान-ए-शम्स-ए-तबरेज़ी”, एक ऐसा दीवान जो आज भी फ़ारसी अदब की सबसे बड़ी नियामतों में गिना जाता है।

वक़्त गुज़रा, रूमी को दो और साथी मिले, पहले सलाहुद्दीन ज़रकूब नाम के एक सीधे-सादे सुनार, जो क़रीब दस बरस तक उनके साथ रहे, फिर हुसामुद्दीन चलबी। हुसामुद्दीन के इसरार पर ही रूमी ने अपनी सबसे बड़ी कृति शुरू की, “मसनवी”, एक छह जिल्दों की महाकाव्य रचना, जिसमें उन्होंने इश्क़, ख़ुदा, और इंसान के आपसी रिश्ते को समझाया। ये रचना उनकी मौत तक अधूरी ही रही।

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आख़िरी सफ़र

17 दिसंबर 1273 को रूमी का इंतक़ाल हुआ। कहते हैं, उनके जनाज़े में सिर्फ़ मुसलमान नहीं, बल्कि ईसाई, यहूदी, हर मज़हब के लोग शामिल हुए, क्योंकि रूमी ने ज़िंदगी भर सिखाया था कि मोहब्बत की कोई सरहद नहीं होती। उन्हें उनके वालिद के पहलू में दफ़नाया गया, और उस जगह आज “ग्रीन टूम्ब” यानी मेवलाना म्यूज़ियम खड़ा है, जहाँ आज भी हर साल लाखों ज़ायरीन आते हैं।

रूमी के शागिर्दों ने आगे चलकर “मेवलेवी सिलसिला” शुरू किया, वही सिलसिला जिसे दुनिया आज “व्हर्लिंग दरवेश” के नाम से जानती है, वो घूमते हुए दरवेश जो नाचते-नाचते ख़ुदा से जुड़ने की कोशिश करते हैं। ये नृत्य असल में रूमी की उसी तड़प का प्रतीक है, जो उन्होंने शम्स की जुदाई में महसूस की थी।

विरासत: जो सात सौ साल बाद भी ज़िंदा है

आज रूमी की शायरी बीस से ज़्यादा ज़बानों में अनुवादित हो चुकी है। अमेरिका में, कोलमैन बार्क्स के अनुवादों की बदौलत, रूमी वहाँ के सबसे ज़्यादा बिकने वाले शायरों में गिने जाते हैं, एक तेरहवीं सदी के फ़ारसी सूफ़ी संत का इस क़दर आज की दुनिया में ज़िंदा रहना, अपने आप में एक करिश्मा है।

अगर आप गहराई से जानना चाहें कि रूमी की सोच आज के इंसानी रिश्तों को कैसे समझा सकती है, तो उनकी वही मशहूर नज़्म, “गलत और सही के पार”, पढ़ना एक अच्छी शुरुआत होगी, जिसमें रूमी इंसानी रिश्तों की उलझनों को एक ही सतर में सुलझा देते हैं।

कहानी जारी है, अगले सफ़े पे