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गलत और सही के पार.. रूमी का वो फलसफा जो 800 साल बाद भी ज़िंदा है

रूमी की वो नज़्म जो 800 साल बाद भी ज़िंदा है और फ़िल्म रॉकस्टार के मशहूर डायलॉग में ढली। जानिए ग़लत और सही के पार के मैदान का मतलब।

ग़लत और सही के पार - रूमी का फ़लसफ़ा

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा

यही सवाल है जो रूमी ने 800 साल पहले एक नज़म में पूछा था। और इसी नज़म को फिल्म रॉकस्टार में एक ऐसे डायलॉग की शक्ल दी गई, जो आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में गूंजता है।

“पता है, यहाँ से बहुत दूर, गलत और सही के पार, एक मैदान है।” यह सिर्फ एक डायलॉग नहीं है। यह एक दर्शन है। एक ऐसा फलसफा जो आपको किसी भी रोज़ सुबह जगा सकता है और रात को सोचते हुए बिस्तर पर ले जा सकता है।

ग़लत और सही के पार, रॉकस्टार और रूमी की मुलाकात

साल 2011। इम्तियाज़ अली की फिल्म रॉकस्टार ने सिनेमाघरों में एक अलग ही हलचल मचाई थी। रणबीर कपूर, ए. आर. रहमान का संगीत, और बीच में यह संवाद जो दिल को पकड़ लेता था।

पर बहुत कम लोग जानते हैं कि यह डायलॉग असल में रूमी की एक नज़म से लिया गया था। रूमी… यानी जलालुद्दीन मुहम्मद रूमी। फारसी अदब के वो महान शायर जिन्होंने १३वीं सदी में लिखा और आज भी पूरी दुनिया उनके कलाम की दीवानी है। सूफी संत, इस्लामी विद्वान, और एक ऐसे इंसान जो मानते थे कि मोहब्बत हर तरह की सीमाओं से ऊपर है।

उनकी सबसे मशहूर काव्यात्मक कृति “मसनवी” है, छह किताबों में फैला एक ऐसा काव्य-संग्रह जिसे आज भी फारसी साहित्य का ताज कहा जाता है। इनके बारे में विस्तार से पढ़ना हो तो रूमी की जीवनी यहाँ पढ़ें।

फिल्म रॉकस्टार में इम्तियाज़ अली ने इस नज़म को एक नए रंग में पेश किया। उन्होंने रूमी के उस ख़याल को एक आधुनिक मोहब्बत की कहानी से जोड़ा। और नतीजा? एक ऐसा डायलॉग जो फिल्म की रिलीज़ के १५ साल बाद भी इंटरनेट पर बार-बार शेयर होता है।

वो नज़म जो दिल में उतर जाती है

यह नज़म पढ़ो। धीरे-धीरे। हर लाइन पर रुको।

पता है , यहाँ से बहुत दूर, गलत और सही के पार, एक मैदान है.. मैं वहां मिलूंगा तुझे… तुम, तुमसे मिलना, तुम्हारे बारे में सोचना, सारी दुनिया भर के काम छोड़ कर तुमसे मिलना, जो कभी नहीं किया, वो करना… सब, सब गलत है… लेकिन अगर गलत है तो गलत लग क्यूँ नहीं रहा..

कहाँ है ये सही और गलत…? जहां मैं हूँ, वहां से कुछ सफ़ेद या काला नहीं है… सब कुछ, कई रंगों का है, सब कुछ, हर पल , नया रंग ओढ़ता है.. सब कुछ…. सही भी है, और गलत भी…

मेरी सारी दुनिया ही, उस सही और गलत के पार का मैदान है… और यहाँ, इस मैदान में, मुझे वो सब लोग मिलते हैं, जो मेरी तरह, सबरंग में देखते हैं.. सब की आँखें ख़राब हैं… दिमाग भी… सब एक जैसे हैं…

कहानी जारी है, अगले सफ़े पे