मिर्ज़ा ग़ालिब: उर्दू अदब के आफ़ताब की मुकम्मल कहानी
Mirza Ghalib
Mirza Ghalib Biography Hindi कुछ नाम ऐसे होते हैं जिन्हें किसी तारुफ़ की ज़रूरत नहीं होती। बस नाम लो, और एक पूरी दुनिया आँखों के सामने खिंच आती है। मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ाँ “ग़ालिब” का नाम कुछ ऐसा ही है, मेरे दोस्त। जब भी ज़िंदगी भारी लगे, जब इश्क़ नाकाम हो, जब वजूद का कोई सवाल ... Read more
Mirza Ghalib Biography Hindi
कुछ नाम ऐसे होते हैं जिन्हें किसी तारुफ़ की ज़रूरत नहीं होती। बस नाम लो, और एक पूरी दुनिया आँखों के सामने खिंच आती है। मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ाँ “ग़ालिब” का नाम कुछ ऐसा ही है, मेरे दोस्त।
जब भी ज़िंदगी भारी लगे, जब इश्क़ नाकाम हो, जब वजूद का कोई सवाल जवाब न दे, तब ग़ालिब का कोई न कोई शेर सामने आ खड़ा होता है। जैसे वो जानते थे कि हम आएंगे। जैसे उन्होंने हमारे लिए ही लिखा था।
१८वीं सदी के आख़िर में पैदा हुए इस अज़ीम शाइर ने उस दौर में आँखें खोलीं जब हिंदुस्तान की पुरानी तहज़ीब दम तोड़ रही थी। मुग़ल सल्तनत का सूरज डूब रहा था। और उसी डूबती रोशनी में ग़ालिब ने एक ऐसी शाइरी रची जो आज तक नहीं बुझी।
khoobsuratandaaz.com पर हम ग़ालिब की उस पूरी ज़िंदगी को आपके सामने लाना चाहते हैं, जो तारीखों और तथ्यों से परे है। वो ज़िंदगी जिसमें दर्द था, क़र्ज़ था, हँसी थी, आम थे, शराब थी, और इन सबके बीच वो लाज़वाल शाइरी थी जो आज भी हमारी रूह से बातें करती है।
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मिर्ज़ा ग़ालिब: एक दिग्गज की इब्तिदाई दास्तान
समरक़ंद से चला एक क़ाफ़िला, और हिंदुस्तान को मिला उसका सबसे बड़ा शाइर। ग़ालिब का ताल्लुक़ एक मुअज़्ज़ज़ तुर्क घराने से था। उनके दादा मिर्ज़ा क़ोक़ान बेग ख़ाँ समरक़ंद से हिजरत करके हिंदुस्तान आए और आगरा में सुकूनत इख़्तियार की।
२७ दिसंबर १७९७ को आगरा के ‘काला महल’ में एक बच्चे ने जन्म लिया। नाम रखा गया मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ाँ। ‘असद’ यानी शेर। मौला अली का लक़ब। और सच में, ये नाम उन पर बिल्कुल सही बैठा।
बचपन ग़मों का साथी रहा। पाँच साल की उम्र में वालिद चले गए, एक लड़ाई में शहीद होकर। चचा मिर्ज़ा नसरुल्लाह बेग ने सहारा दिया, लेकिन वो सहारा भी नौ साल की उम्र में छिन गया। इस तरह ग़ालिब ने बचपन में ही सीख लिया कि ज़िंदगी किसी का इंतज़ार नहीं करती।
| रिश्ता | नाम और विवरण |
|---|---|
| दादा | मिर्ज़ा क़ोक़ान बेग ख़ाँ (समरक़ंद से आए) |
| वालिद | मिर्ज़ा अब्दुल्लाह बेग ख़ाँ (१८०३ में वफ़ात) |
| वालिदा | इज़्ज़त-उल-निसा बेगम |
| चचा | मिर्ज़ा नसरुल्लाह बेग ख़ाँ (१८०६ में वफ़ात) |
| भाई | मिर्ज़ा यूसुफ़ (मानसिक रोग से पीड़ित) |
‘ग़ालिब’ नाम कहाँ से आया?
ग्यारह साल की उम्र में शाइरी शुरू कर दी थी उन्होंने। पहला तख़ल्लुस था ‘असद’। लेकिन बाद में उन्होंने चुना ‘ग़ालिब’, यानी जो ग़ालिब आए, जो जीत जाए, जो ओवरपावर कर दे। और देखिए, नाम ने कितना सच निभाया।
एक ईरानी सैयाह ‘अब्दुस समद’ का भी ज़िक्र आता है, जो क़रीब चौदह साल की उम्र में ग़ालिब के घर दो साल ठहरे और उन्हें फ़ारसी की बारीकियाँ सिखाईं। बाज़ नक़्क़ाद इसे फर्जी मानते हैं। पर एक बात कहूँ, जिसकी फ़ारसी पर ग़ालिब जैसी दस्तरस हो, उसे कोई न कोई आला उस्ताद तो मिला ही होगा।
मिर्ज़ा ग़ालिब: दिल्ली की रौनक़ें और एक नई शुरुआत
तेरह साल की उम्र में निकाह हो गया। दिल्ली के नवाब इलाही बख़्श ‘मारूफ़’ की साहिबज़ादी उमराव बेगम से। और फिर १८१२ के क़रीब ग़ालिब मुस्तक़िल तौर पर दिल्ली आ गए।
दिल्ली उस वक़्त हिंदुस्तान का अदबी और तहज़ीबी मरकज़ था। मुशायरे, महफ़िलें, चाँदनी चौक की रौनक़ें। ग़ालिब ने इस शहर को अपना बना लिया और इस शहर ने उन्हें। बल्लीमारान की गलियों में घूमते हुए उन्होंने जो शाइरी रची, उसकी ख़ुशबू आज भी उन गलियों में बसी है।
माली हालत कभी मुस्तहकम नहीं रही। क़र्ज़ था, तंगदस्ती थी। पर रहन-सहन हमेशा नवाबना रहा। ये ग़ालिब की अना थी। और ये अना उनकी शाइरी में भी उतनी ही साफ़ दिखती है।
मिर्ज़ा ग़ालिब: कलकत्ता का वो तारीख़ी सफ़र
१८२७ में ग़ालिब ने एक लंबा सफ़र किया। पेंशन की अर्ज़ी लेकर कलकत्ता निकले, जो उस वक़्त ब्रितानी हिंदुस्तान की राजधानी थी। रास्ते में लखनऊ और बनारस भी रुके। बनारस से वो इस क़दर मुतास्सिर हुए कि उन्होंने फ़ारसी में मसनवी ‘चिराग़-ए-दैर’ लिखी और बनारस को ‘हिंदुस्तान का काबा’ कह दिया।
पेंशन के मुक़दमे में नाकामी हुई। पर इस सफ़र ने उनका जहनी उफ़ुक वसी कर दिया। उन्होंने अंग्रेज़ों की जदीदियत देखी, छापाखाने देखे, और महसूस किया कि मुग़ल अहद की रवायतें पुरानी पड़ चुकी हैं। ये एहसास उनकी शाइरी में बाद में साफ़ नज़र आता है।
| आमदनी का ज़रिया | रक़म / विवरण |
|---|---|
| चचा की पेंशन (१८२७ तक) | ५२ रुपये ८ आने माहवार |
| मुग़ल दरबार से वज़ीफ़ा (१८५०) | ६०० रुपये सालाना |
| नवाब रामपुर से वज़ीफ़ा | १०० रुपये माहवार |
| अवध के राजा का इनाम | ५००० रुपये (कभी नहीं मिले) |
किला-ए-मुअल्ला और बहादुर शाह ज़फ़र का दरबार
दिल्ली के शाही दरबार में ग़ालिब की रसाई एक लंबी कोशिश का नतीजा थी। उस वक़्त दरबार के मल्कुल-शोरा शेख़ इब्राहिम ‘ज़ौक़’ थे। ग़ालिब और ज़ौक़ के दरमियान हमेशा एक अदबी रक़ाबत कायम रही। ग़ालिब को लगता था कि ज़ौक़ की शाइरी महज़ लफ़्ज़ों का खेल है, उनकी अपनी शाइरी में फ़लसफ़ा है।
१८५० में आख़िरकार मुक़ाम मिला। बहादुर शाह ज़फ़र ने उन्हें ‘नज़्म-उद-दौला’ और ‘दबीर-उल-मुल्क’ के ख़िताब अता किए। ख़ानदान-ए-तैमूरिया की तारीख़ लिखने का काम सौंपा। और १८५४ में ज़ौक़ की वफ़ात के बाद ग़ालिब बादशाह के उस्ताद बने।
ये ग़ालिब की ज़िंदगी का सबसे सुनहरा दौर था। पर सुनहरे दौर की उम्र कम होती है।
१८५७ और ‘दस्तंबू’ का दर्द जिसने मिर्ज़ा ग़ालिब को बदल दिया
फिर वो तूफ़ान आया जिसने सब कुछ बदल दिया।
११ मई १८५७ को जब बागी सिपाहियों ने दिल्ली में दाखला लिया, ग़ालिब ने अपने घर के दरवाज़े बंद कर लिए। महीनों बाहर नहीं निकले। उन्होंने अपनी आँखों से वो दिल्ली देखी जो उन्हें अज़ीज़ थी, मलबे में तब्दील होते हुए।
उन्होंने अपनी फ़ारसी डायरी ‘दस्तंबू’ में बागियों की सख्त मज़म्मत की। ये उनकी मजबूरी भी थी, अंग्रेज़ों की पेंशन पर गुज़ारा जो था। पर उनके ज़ाती ख़ुतूत की सच्चाई अलग थी। उन्होंने लिखा: ऐ मेरे दोस्त, दिल्ली अब कहाँ है? अब ये महज़ एक फौजी कैंप है।
भाई मिर्ज़ा यूसुफ़ की मौत इसी दौरान हुई और ग़ालिब उनके जनाज़े में भी शामिल नहीं हो सके। मुग़ल दरबार ख़त्म हुआ, बहादुर शाह ज़फ़र रंगून भेजे गए, पेंशन बंद हो गई। ग़ालिब के पास सिर्फ उनकी क़लम बची।
मिर्ज़ा ग़ालिब की ज़िंदगी की तल्ख़ियाँ और ‘आरिफ़’ का जाना
शादीशुदा ज़िंदगी कभी खुशगवार नहीं रही। उमराव बेगम निहायत मज़हबी और परहेज़गार थीं, ग़ालिब आज़ादख्याल और शराब-ओ-कबाब के शौकीन। सात बच्चे पैदा हुए। कोई नहीं बचा। हर एक की मौत ने ग़ालिब को थोड़ा और तोड़ा।
उन्होंने अपनी बीवी के भतीजे जैन-उल-आबिदीन ख़ाँ ‘आरिफ़’ को गोद लिया। उससे अपना दिल लगाया। उसे अपना सहारा बनाया। और फिर १८५२ में आरिफ़ भी जवानी में चला गया।
ग़ालिब ने जो मर्सिया लिखा, वो उर्दू के सबसे गमगीन कलाम में से है:
लाज़िम था कि देखो मेरा रस्ता कोई दिन और… तन्हा गए क्यों? अब रहो तन्हा कोई दिन और.
१८४७ में जुए के इल्ज़ाम में जेल भी हुई। ये ग़ालिब के लिए निहायत जिल्लत का वाक़या था। पर उन्होंने इस दर्द को भी अपनी शाइरी में समेट लिया। यही तो ग़ालिब का हुनर था।
आम, शराब और हाज़िरजवाबी का जादू
ग़ालिब की शख़्सियत का सबसे दिलचस्प पहलू उनकी जिंदादिली थी। आम से उनकी मोहब्बत तो ज़रबुल-मसल बन चुकी है। एक बार बहादुर शाह ज़फ़र के साथ बाग़ में टहलते हुए वो आमों को बहुत गौर से देख रहे थे। बादशाह ने पूछा, मिर्ज़ा, क्या देख रहे हो? ग़ालिब ने फ़ौरन जवाब दिया, हुज़ूर, देख रहा हूँ कि क्या किसी दाने पर मेरे और मेरे बाप-दादा का नाम भी लिखा है? बादशाह मुस्कुराए और उसी शाम उम्दा आमों की टोकरियाँ उनके घर भेज दीं।
शराब के बारे में बेबाक थे। खुद को ‘आधा मुसलमान’ कहते थे क्योंकि शराब पीते थे पर सूअर का गोश्त नहीं खाते थे। इस हाज़िरजवाबी ने उन्हें दरबार और अवाम, दोनों में मक़बूल बनाया।
उर्दू नस्र में इंकलाब: मिर्ज़ा ग़ालिब के ख़ुतूत
ग़ालिब की सबसे बड़ी देन शाइरी से आगे जाती है। उन्होंने उर्दू नस्र को एक नई शक्ल दी। १८५० के बाद उन्होंने दोस्तों को उर्दू में ख़त लिखना शुरू किया। उस वक़्त उर्दू में ख़त लिखना तक़ल्लुफ़ात से भरा काम था। ग़ालिब ने वो रस्म तोड़ी। उन्होंने मुरासले को मुकालमा बना दिया। उनके ख़त पढ़कर लगता है जैसे वो सामने बैठकर बातें कर रहे हों।
उनके ख़तों के मजमुए ‘ऊद-ए-हिंदी’ और ‘उर्दू-ए-मुअल्ला’ आज भी उर्दू अदब के शाहकार माने जाते हैं। इनमें न सिर्फ ग़ालिब की ज़िंदगी है, बल्कि १८५७ के बाद की दिल्ली की पूरी सामाजिक और सियासी तारीख़ भी महफ़ूज़ है।
| तसनीफ़ | विधा | ज़बान |
|---|---|---|
| दीवान-ए-ग़ालिब | ग़ज़ल / शाइरी | उर्दू |
| कुल्लियात-ए-फ़ारसी | शाइरी | फ़ारसी |
| दस्तंबू | डायरी / तारीख़ | फ़ारसी |
| ऊद-ए-हिंदी | ख़तूत | उर्दू |
| उर्दू-ए-मुअल्ला | ख़तूत | उर्दू |
| क़ाते-ए-बुरहान | आलोचना / लुग़त | फ़ारसी |
फ़लसफ़ा-ए-ग़ालिब: वो अश्आर जो रूह तक पहुँचते हैं
ग़ालिब की शाइरी महज़ अल्फ़ाज़ का मजमुआ नहीं। फ़िक्र और फ़लसफ़े की एक गहरी नदी है। एक बात कहूँ, उनके शेर को पहली बार पढ़ो तो एक मतलब निकलता है, दूसरी बार पढ़ो तो दूसरा। यही उनकी अज़मत है।
ज़िंदगी और ग़म की यकजाई:
क़ैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं… मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाए क्यों?जब तक ज़िंदगी है, ग़म साथ रहेगा। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ये बात किसी और ने इतनी सफ़ाई से नहीं कही।
हसरतों का बेअंत सिलसिला:
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले… बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले.
इंसान की ना-मुतनाही आरज़ुओं की इससे बेहतर अकासी शायद मुमकिन नहीं।
वजूद का सवाल:
ना था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ ना होता तो ख़ुदा होता… डुबोया मुझको होने ने, ना होता मैं तो क्या होता?
ये शेर फ़लसफ़े की किताबों में पढ़ाया जाना चाहिए। वजूद है तभी मसला है। न होते तो शायद ख़ुदा में ही शामिल होते।
किताब
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ग़ालिब और ख़ुदा: एक बेतकल्लुफ़ रिश्ता
ग़ालिब किसी एक मसलक की तंग गलियों में बंद होने वाले इंसान नहीं थे। वो एक आज़ादख्याल सूफ़ी थे। जाहिदों और मुल्लाओं के तंज़िया अंदाज़ के सख्त ख़िलाफ़। उनके लिए इबादत महज़ सजदे का नाम नहीं, दिल की सच्चाई का नाम था।
उन्होंने लिखा: बंदगी में भी वो आज़ाद-ओ-ख़ुदबीं हैं कि हम... उल्टे फिर आए दर-ए-काबा अगर वा न हुआ.
यानी अगर ख़ुदा का घर भी बंद मिला, तो मैं अपनी अना के साथ वापस आ जाऊँगा। मिन्नतें नहीं करूँगा। ये बेतकल्लुफ़ी, ये रिश्ता, यही ग़ालिब को बाक़ी सबसे अलग करता है।
आख़िरी अय्याम: एक शहर का जनाज़ा और एक शाइर का सुकूत
ज़िंदगी के आख़िरी सालों में ग़ालिब बहुत कमज़ोर हो गए थे। सुनाई कम देता था। तंगदस्ती ने घेर रखा था। वो दोस्त जो थे, या तो मर चुके थे या तड़ीपार हो गए थे। और वो दिल्ली जिससे उन्होंने मोहब्बत की थी, वो भी अब वही नहीं रही थी।
उन्होंने ख़ुद अपनी मौत के बारे में कहा था: हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है... वो हर एक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता.
१५ फरवरी १८६९ को उर्दू अदब का ये आफ़ताब हमेशा के लिए ग़ुरूब हो गया। उन्हें हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के क़रीब सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।
ग़ालिब की विरासत: जो ग़ुरूब हुआ वो बुझा नहीं
मौलाना हाली ने ‘यादगार-ए-ग़ालिब’ लिखकर उन्हें एक नई ज़िंदगी दी। आज दुनिया के हर बड़े अदब में ग़ालिब को शेक्सपियर, दांते और गोएथे के बराबर मकाम दिया जाता है। हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों में ग़ालिब एक सक़ाफ़ती प्रतीक बन चुके हैं।
| यादगार / सम्मान | विवरण |
|---|---|
| ग़ालिब की हवेली, बल्लीमारान | अब एक संग्रहालय है |
| ग़ालिब अकादमी, निज़ामुद्दीन | शोध और प्रकाशन का मरकज़ |
| गूगल डूडल (२०१७) | २२०वीं जयंती पर जारी |
| जामिया मिलिया में प्रतिमा | दिल्ली में स्थायी स्मारक |
ग़ालिब आज भी हमारे दरमियान हैं
मिर्ज़ा ग़ालिब ने ख़ुद कहा था, शाइर हूँ मैं भी, पर ज़माने के बाद समझा जाऊँगा। और देखिए, उनकी बात सच निकली।
आज जब हम किसी मुश्किल में होते हैं, किसी नाकाम इश्क़ का दर्द होता है, या बस ज़िंदगी बेमतलब लगने लगती है, तो ग़ालिब का कोई शेर आता है और कहता है, मैं भी यहाँ से गुज़रा था। तुम अकेले नहीं हो।
khoobsuratandaaz.com पर हमने देखा कि कैसे एक इंसान अपनी तमाम कमियों और मजबूरियों के बावजूद अपने फन के ज़रिए अमर हो जाता है। ग़ालिब कल भी अज़ीम थे, आज भी अज़ीम हैं। और जब तक उर्दू ज़बान ज़िंदा है, ग़ालिब का अंदाज़-ए-बयाँ ज़िंदा रहेगा।
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे... कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और.
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