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मिर्ज़ा ग़ालिब: उर्दू अदब के आफ़ताब की मुकम्मल कहानी

मिर्ज़ा ग़ालिब की ज़िंदगी, इश्क़, ग़म और शायरी की मुकम्मल कहानी। जानिए आगरा से दिल्ली तक उर्दू अदब के इस आफ़ताब का सफ़र और उनके अमर शेर।

मिर्ज़ा ग़ालिब: उर्दू अदब के आफ़ताब की मुकम्मल कहानी

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा

मिर्ज़ा ग़ालिब: दिल्ली की रौनक़ें और एक नई शुरुआत

तेरह साल की उम्र में निकाह हो गया। दिल्ली के नवाब इलाही बख़्श ‘मारूफ़’ की साहिबज़ादी उमराव बेगम से। और फिर १८१२ के क़रीब ग़ालिब मुस्तक़िल तौर पर दिल्ली आ गए।

दिल्ली उस वक़्त हिंदुस्तान का अदबी और तहज़ीबी मरकज़ था। मुशायरे, महफ़िलें, चाँदनी चौक की रौनक़ें। ग़ालिब ने इस शहर को अपना बना लिया और इस शहर ने उन्हें। बल्लीमारान की गलियों में घूमते हुए उन्होंने जो शाइरी रची, उसकी ख़ुशबू आज भी उन गलियों में बसी है।

माली हालत कभी मुस्तहकम नहीं रही। क़र्ज़ था, तंगदस्ती थी। पर रहन-सहन हमेशा नवाबना रहा। ये ग़ालिब की अना थी। और ये अना उनकी शाइरी में भी उतनी ही साफ़ दिखती है।

मिर्ज़ा ग़ालिब: कलकत्ता का वो तारीख़ी सफ़र

१८२७ में ग़ालिब ने एक लंबा सफ़र किया। पेंशन की अर्ज़ी लेकर कलकत्ता निकले, जो उस वक़्त ब्रितानी हिंदुस्तान की राजधानी थी। रास्ते में लखनऊ और बनारस भी रुके। बनारस से वो इस क़दर मुतास्सिर हुए कि उन्होंने फ़ारसी में मसनवी ‘चिराग़-ए-दैर’ लिखी और बनारस को ‘हिंदुस्तान का काबा’ कह दिया।

पेंशन के मुक़दमे में नाकामी हुई। पर इस सफ़र ने उनका जहनी उफ़ुक वसी कर दिया। उन्होंने अंग्रेज़ों की जदीदियत देखी, छापाखाने देखे, और महसूस किया कि मुग़ल अहद की रवायतें पुरानी पड़ चुकी हैं। ये एहसास उनकी शाइरी में बाद में साफ़ नज़र आता है।

आमदनी का ज़रियारक़म / विवरण
चचा की पेंशन (१८२७ तक)५२ रुपये ८ आने माहवार
मुग़ल दरबार से वज़ीफ़ा (१८५०)६०० रुपये सालाना
नवाब रामपुर से वज़ीफ़ा१०० रुपये माहवार
अवध के राजा का इनाम५००० रुपये (कभी नहीं मिले)

किला-ए-मुअल्ला और बहादुर शाह ज़फ़र का दरबार

दिल्ली के शाही दरबार में ग़ालिब की रसाई एक लंबी कोशिश का नतीजा थी। उस वक़्त दरबार के मल्कुल-शोरा शेख़ इब्राहिम ‘ज़ौक़’ थे। ग़ालिब और ज़ौक़ के दरमियान हमेशा एक अदबी रक़ाबत कायम रही। ग़ालिब को लगता था कि ज़ौक़ की शाइरी महज़ लफ़्ज़ों का खेल है, उनकी अपनी शाइरी में फ़लसफ़ा है।

१८५० में आख़िरकार मुक़ाम मिला। बहादुर शाह ज़फ़र ने उन्हें ‘नज़्म-उद-दौला’ और ‘दबीर-उल-मुल्क’ के ख़िताब अता किए। ख़ानदान-ए-तैमूरिया की तारीख़ लिखने का काम सौंपा। और १८५४ में ज़ौक़ की वफ़ात के बाद ग़ालिब बादशाह के उस्ताद बने।

ये ग़ालिब की ज़िंदगी का सबसे सुनहरा दौर था। पर सुनहरे दौर की उम्र कम होती है।

१८५७ और ‘दस्तंबू’ का दर्द जिसने मिर्ज़ा ग़ालिब को बदल दिया

फिर वो तूफ़ान आया जिसने सब कुछ बदल दिया।

११ मई १८५७ को जब बागी सिपाहियों ने दिल्ली में दाखला लिया, ग़ालिब ने अपने घर के दरवाज़े बंद कर लिए। महीनों बाहर नहीं निकले। उन्होंने अपनी आँखों से वो दिल्ली देखी जो उन्हें अज़ीज़ थी, मलबे में तब्दील होते हुए।

कहानी जारी है, अगले सफ़े पे