मिर्ज़ा ग़ालिब: उर्दू अदब के आफ़ताब की मुकम्मल कहानी
मिर्ज़ा ग़ालिब की ज़िंदगी, इश्क़, ग़म और शायरी की मुकम्मल कहानी। जानिए आगरा से दिल्ली तक उर्दू अदब के इस आफ़ताब का सफ़र और उनके अमर शेर।

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा
१५ फरवरी १८६९ को उर्दू अदब का ये आफ़ताब हमेशा के लिए ग़ुरूब हो गया। उन्हें हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के क़रीब सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।
ग़ालिब की विरासत: जो ग़ुरूब हुआ वो बुझा नहीं
मौलाना हाली ने ‘यादगार-ए-ग़ालिब’ लिखकर उन्हें एक नई ज़िंदगी दी। आज दुनिया के हर बड़े अदब में ग़ालिब को शेक्सपियर, दांते और गोएथे के बराबर मकाम दिया जाता है। हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों में ग़ालिब एक सक़ाफ़ती प्रतीक बन चुके हैं।
| यादगार / सम्मान | विवरण |
|---|---|
| ग़ालिब की हवेली, बल्लीमारान | अब एक संग्रहालय है |
| ग़ालिब अकादमी, निज़ामुद्दीन | शोध और प्रकाशन का मरकज़ |
| गूगल डूडल (२०१७) | २२०वीं जयंती पर जारी |
| जामिया मिलिया में प्रतिमा | दिल्ली में स्थायी स्मारक |
ग़ालिब आज भी हमारे दरमियान हैं
मिर्ज़ा ग़ालिब ने ख़ुद कहा था, शाइर हूँ मैं भी, पर ज़माने के बाद समझा जाऊँगा। और देखिए, उनकी बात सच निकली।
आज जब हम किसी मुश्किल में होते हैं, किसी नाकाम इश्क़ का दर्द होता है, या बस ज़िंदगी बेमतलब लगने लगती है, तो ग़ालिब का कोई शेर आता है और कहता है, मैं भी यहाँ से गुज़रा था। तुम अकेले नहीं हो।
khoobsuratandaaz.com पर हमने देखा कि कैसे एक इंसान अपनी तमाम कमियों और मजबूरियों के बावजूद अपने फन के ज़रिए अमर हो जाता है। ग़ालिब कल भी अज़ीम थे, आज भी अज़ीम हैं। और जब तक उर्दू ज़बान ज़िंदा है, ग़ालिब का अंदाज़-ए-बयाँ ज़िंदा रहेगा।
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे... कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और.
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