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मिर्ज़ा ग़ालिब: उर्दू अदब के आफ़ताब की मुकम्मल कहानी

मिर्ज़ा ग़ालिब की ज़िंदगी, इश्क़, ग़म और शायरी की मुकम्मल कहानी। जानिए आगरा से दिल्ली तक उर्दू अदब के इस आफ़ताब का सफ़र और उनके अमर शेर।

मिर्ज़ा ग़ालिब: उर्दू अदब के आफ़ताब की मुकम्मल कहानी

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा

उन्होंने अपनी फ़ारसी डायरी ‘दस्तंबू’ में बागियों की सख्त मज़म्मत की। ये उनकी मजबूरी भी थी, अंग्रेज़ों की पेंशन पर गुज़ारा जो था। पर उनके ज़ाती ख़ुतूत की सच्चाई अलग थी। उन्होंने लिखा: ऐ मेरे दोस्त, दिल्ली अब कहाँ है? अब ये महज़ एक फौजी कैंप है।

भाई मिर्ज़ा यूसुफ़ की मौत इसी दौरान हुई और ग़ालिब उनके जनाज़े में भी शामिल नहीं हो सके। मुग़ल दरबार ख़त्म हुआ, बहादुर शाह ज़फ़र रंगून भेजे गए, पेंशन बंद हो गई। ग़ालिब के पास सिर्फ उनकी क़लम बची।

मिर्ज़ा ग़ालिब की ज़िंदगी की तल्ख़ियाँ और ‘आरिफ़’ का जाना

शादीशुदा ज़िंदगी कभी खुशगवार नहीं रही। उमराव बेगम निहायत मज़हबी और परहेज़गार थीं, ग़ालिब आज़ादख्याल और शराब-ओ-कबाब के शौकीन। सात बच्चे पैदा हुए। कोई नहीं बचा। हर एक की मौत ने ग़ालिब को थोड़ा और तोड़ा।

उन्होंने अपनी बीवी के भतीजे जैन-उल-आबिदीन ख़ाँ ‘आरिफ़’ को गोद लिया। उससे अपना दिल लगाया। उसे अपना सहारा बनाया। और फिर १८५२ में आरिफ़ भी जवानी में चला गया।

ग़ालिब ने जो मर्सिया लिखा, वो उर्दू के सबसे गमगीन कलाम में से है:

लाज़िम था कि देखो मेरा रस्ता कोई दिन और… तन्हा गए क्यों? अब रहो तन्हा कोई दिन और.

१८४७ में जुए के इल्ज़ाम में जेल भी हुई। ये ग़ालिब के लिए निहायत जिल्लत का वाक़या था। पर उन्होंने इस दर्द को भी अपनी शाइरी में समेट लिया। यही तो ग़ालिब का हुनर था।

आम, शराब और हाज़िरजवाबी का जादू

ग़ालिब की शख़्सियत का सबसे दिलचस्प पहलू उनकी जिंदादिली थी। आम से उनकी मोहब्बत तो ज़रबुल-मसल बन चुकी है। एक बार बहादुर शाह ज़फ़र के साथ बाग़ में टहलते हुए वो आमों को बहुत गौर से देख रहे थे। बादशाह ने पूछा, मिर्ज़ा, क्या देख रहे हो? ग़ालिब ने फ़ौरन जवाब दिया, हुज़ूर, देख रहा हूँ कि क्या किसी दाने पर मेरे और मेरे बाप-दादा का नाम भी लिखा है? बादशाह मुस्कुराए और उसी शाम उम्दा आमों की टोकरियाँ उनके घर भेज दीं।

शराब के बारे में बेबाक थे। खुद को ‘आधा मुसलमान’ कहते थे क्योंकि शराब पीते थे पर सूअर का गोश्त नहीं खाते थे। इस हाज़िरजवाबी ने उन्हें दरबार और अवाम, दोनों में मक़बूल बनाया।

उर्दू नस्र में इंकलाब: मिर्ज़ा ग़ालिब के ख़ुतूत

ग़ालिब की सबसे बड़ी देन शाइरी से आगे जाती है। उन्होंने उर्दू नस्र को एक नई शक्ल दी। १८५० के बाद उन्होंने दोस्तों को उर्दू में ख़त लिखना शुरू किया। उस वक़्त उर्दू में ख़त लिखना तक़ल्लुफ़ात से भरा काम था। ग़ालिब ने वो रस्म तोड़ी। उन्होंने मुरासले को मुकालमा बना दिया। उनके ख़त पढ़कर लगता है जैसे वो सामने बैठकर बातें कर रहे हों।

कहानी जारी है, अगले सफ़े पे