दानिश अलीगड़ी: जिनकी ग़ज़ल सबने सुनी, पर नाम बहुत कम लोगों ने
दो जवाँ दिलों का ग़म के शायर दानिश अलीगड़ी कौन थे? अलीगड़ से उनके शेरों के तीन रंग और हुसैन बंधुओं की आवाज़ तक की कहानी पढ़िए।

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा
किसी ने रात में अकेले बैठकर वो ग़ज़ल सुनी होगी। हुसैन बंधुओं की आवाज़, हर शेर के आख़िर में एक ख़ामोश गवाह। पर क्या कभी रुककर सोचा कि ये शेर किसने लिखे? एल्बम के क्रेडिट में एक नाम लिखा है: दानिश अलीगड़ी।
हमारे यहाँ मान लिया जाता है कि गाना मशहूर है तो उसे लिखने वाला भी मशहूर होगा। ग़ज़ल की दुनिया में अक्सर उलटा होता है। आवाज़ सबको याद रहती है, और क़लम को कोई-कोई। आज हम उसी क़लम के पीछे चलते हैं।
आवाज़ सबको याद रहती है, क़लम को कोई-कोई याद रखता है।
तफ़्सीलात
| तफ़्सील | मालूमात |
|---|---|
| नाम | दानिश अलीगड़ी |
| तख़ल्लुस | दानिश |
| जन्म | 1931, अलीगड़, उत्तर प्रदेश |
| पहचान | उर्दू शायर |
| उस्ताद | सबा अफ़ग़ानी (बताए जाते हैं) |
| किताब | क़लम का सफ़र (1979) |
| अदब के रिकॉर्ड में | 20 ग़ज़लें, 8 शेर |
| सबसे मशहूर ग़ज़ल | दो जवाँ दिलों का ग़म (अहमद और मोहम्मद हुसैन की आवाज़ में) |
अलीगड़ से निकली क़लम
एक ऐसा शहर, जहाँ तालीम और अदब साथ-साथ चलते थे।
दानिश अलीगड़ी का जन्म 1931 में अलीगड़ में दर्ज है, और अलीगड़ उर्दू तालीम और अदब के बड़े मरकज़ के तौर पर जाना जाता है। उनके नाम से उर्दू अदब में 20 ग़ज़लें और कुछ शेर दर्ज हैं। 1979 में उनकी किताब क़लम का सफ़र आई। सबा अफ़ग़ानी उनके उस्ताद बताए जाते हैं।
उनकी शायरी के तीन रंग
तीन अलग जगहों से निकलती एक ही क़लम।
पहला रंग: मोहब्बत और इंसानियत। उनके कुछ शेरों में प्यार की ख़ुशबू हर ज़र्रे में भरने और नफ़रत की बू हर दिल से निकालने की बात है। एक और शेर दुश्मन को भी ख़ुद आगे बढ़कर गले लगाने की सलाह देता है।
दूसरा रंग: जुदाई, रात और ग़म। कुछ शेरों में जुदाई को ही ज़िंदगी देने वाली चीज़ बताया गया है, और अंधेरे को आख़िरी वक़्त तक साथ निभाने वाला। एक शेर में शायर डरता है कि ग़म की रात का किस्सा महफ़िल में सुनाया तो कहीं महबूब की सूरत सामने न उतर आए। और एक मीठे शेर में हँसकर मिलना और रूठकर बिछड़ना, यही दो बातें एक दिन पूरी दास्तान बनने की बात है।
तीसरा रंग: शायरी पर तंज़। एक शेर में वह पूछते हैं कि अगर शायरी सिर्फ़ तरन्नुम, यानी सुर पर ही टिकी होती, तो दुनिया के सारे शायर गाने वाले बन जाते। दिलचस्प बात यह है कि आज उनकी एक ग़ज़ल गायकों की आवाज़ के ज़रिए भी सुनी जाती है।
दो जवाँ दिलों का ग़म: वो ग़ज़ल जिसने नाम पहचाना
पाँच शेर, छह ख़ामोश गवाह।
हुसैन बंधुओं की आवाज़ में जो ग़ज़ल सबसे ज़्यादा सुनी जाती है, वह दानिश अलीगड़ी की लिखी हुई मानी जाती है। इसके हर शेर का आख़िरी लफ़्ज़ समझती हैं है, और हर शेर में कोई एक चीज़ गवाह बनती है: दूरी, हिचकी, बेड़ियाँ, सीढ़ियाँ, डालियाँ, पुतलियाँ। आख़िरी शेर में उनका अपना तख़ल्लुस दानिश आता है, यानी वहीं उनका अपना दस्तख़त। हर शेर का आसान मतलब हमने दो जवाँ दिलों का ग़म: ग़ज़ल का मतलब में लिखा है।
कहानी जारी है, अगले सफ़े पे