दर-ए-इश्क़: मोहब्बत और खौफ़ की दास्तान
लखनऊ की रहस्यमयी हवेली, सुर्खाब की रूह और आशेर की मोहब्बत की ऐसी दास्तान, जहां इश्क़ और खौफ़ आमने-सामने खड़े हैं।

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा
लखनऊ की एक पुरानी हवेली का राज़
लखनऊ के पुराने मोहल्ले में एक हवेली थी जिसे लोग “दर-ए-मोहब्बत” कहते थे। इस हवेली की दीवारों पर वक़्त की गर्द जम चुकी थी, लेकिन इसके हर कोने में किसी की इंतजार करती खामोशी गूंजती थी। हवेली की कहानियां लोगों की जुबां पर थीं, लेकिन उस खौफ के साथ जिसे सुनकर रूह कांप जाती थी। कहते थे कि वहां एक रूह, सुर्खाब, का साया है, जो अपनी अधूरी मोहब्बत के दर्द में कैद है।
आशेर, एक होशियार और जुनूनी नौजवान, देहली यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के बाद छुट्टियों में लखनऊ आया। बचपन से वह पुरानी इमारतों और उनकी कहानियों से मोहब्बत करता था। उसे हमेशा यकीन था कि हर दास्तान के पीछे एक सच्चाई होती है। हवेली के बारे में सुनकर, उसका दिल बेचैन हो गया।
“आशेर, इस हवेली से दूर रहो। ये कोई आम जगह नहीं है।”
उसके दोस्त यूसुफ़ ने समझाने की कोशिश की।
“डर और सच के बीच का फासला बस हिम्मत है, यूसुफ़। मैं इसे देखना चाहता हूं।”
यूसुफ़ ने मना किया, लेकिन आशेर ने ठान लिया कि वह हवेली के अंदर जाएगा।
चांदनी रात थी, जब आशेर और यूसुफ़ हवेली के पास पहुंचे। हवेली के बड़े, जर्जर गेट पर कुरान की आयतें और यह इबारत लिखी थी:
“इश्क़ यहां सो रहा है। उसे जगाना मत, वरना हमेशा के लिए सो जाओगे।”
यूसुफ़ कांपते हुए बोला, “यहां कुछ अजीब है। मुझे वापस जाना है।”
लेकिन आशेर ने गेट को धक्का दिया। ठंडी हवा का एक झोंका उनकी तरफ बढ़ा, जैसे हवेली ने उन्हें अंदर बुला लिया हो। यूसुफ़ ने घबराते हुए कदम पीछे खींचे, लेकिन आशेर अंदर चला गया।
एक पुरानी हवेली का राज़ और आशेर की पहली दस्तक
हवेली के अंदर का माहौल जैसे किसी पुरानी किताब का जिंदा सफा था। फर्श के टूटे हुए टुकड़ों पर हर कदम गूंजता हुआ महसूस हो रहा था। झाड़-फानूस, जो कभी रोशनी का बेजोड़ नमूना रहा होगा, अब एक गहरी उदासी से झूल रहा था। हर कोने से एक अजीब-सा सन्नाटा फूट रहा था, मानो दीवारों ने किसी अधूरी कहानी को अपने अंदर कैद कर लिया हो।
हवा में एक महक थी, जो नाज़ुक गुलाबों की खुशबू और जलते हुए राख की खुसबू का अजीब खलत (मिश्रण) थी। यह खुसबू दिल को खींचती थी, लेकिन साथ ही रूह को डराती भी थी।
आशेर ने अपनी टॉर्च की रोशनी से चारों तरफ देखा। अचानक, उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे किसी ने उसे पुकारा।
“आशेर…”
उसकी आवाज़ रुक गई। वह ठिठक कर खड़ा हो गया। यह पुकार इतनी कोमल, इतनी मोहक थी कि उसने पलटकर देखे बिना ही महसूस किया कि यह सिर्फ एक आवाज़ नहीं थी।
“कौन है?” उसने आवाज़ देते हुए पूछा।
यूसुफ़, जो डर से कांप रहा था, ने उसके बाजू को पकड़कर कहा, “चलो, वापस चलते हैं। यह जगह सही नहीं लगती।”
“नहीं, यूसुफ़,” आशेर ने धीरे से कहा। “यह जगह मुझे पुकार रही है। मैं देखना चाहता हूँ कि यहां क्या है।”
सुर्खाब की वह पहली झलक
कहानी जारी है, अगले सफ़े पे