ठंडी चाय, ख़ामोश झील और एक सूखा गुलाब: यादों के चार शेर
चाय की भाप से रेल की खिड़की तक, यादों के चार शेर और उनके मतलब।

याद का कोई तय पता नहीं होता। कभी वो चाय के कप से उठती भाप में मिलती है, कभी किसी पुरानी किताब के सफ़े में दबे सूखे गुलाब में, कभी रेल की खिड़की से गुज़रते किसी स्टेशन के नाम में।
इस हफ़्ते के पाँच शेर ऐसी ही छोटी-छोटी जगहों पर बैठी यादों के हैं: सर्द सुबह की चाय, ख़ामोश झील, किताब का एक सफ़ा, रेल का सफ़र और आसमान में उड़ती पतंग। हर शेर के नीचे उसका मतलब भी है।
चाय की भाप
चाय ठंडी हो गई, पर याद की गर्मी रही,
सर्द मौसम में भी तेरे ज़िक्र की नरमी रही।
कप ठंडा हो जाता है, मगर जिसे याद करते हुए चाय पी जा रही थी, उसकी गर्माहट बाक़ी रहती है। सर्दी कितनी भी हो, किसी के ज़िक्र की नरमी साथ चलती है।
झील की ख़ामोशी
कश्ती को अब किनारा नहीं, तेरा सहारा चाहिए,
इस झील-सी ख़ामोशी को बस इक इशारा चाहिए।
जब मन झील की तरह ठहरा हो, तो किसी बड़े सहारे की ज़रूरत नहीं पड़ती। बस एक छोटा-सा इशारा काफ़ी होता है। कश्ती किनारे से ज़्यादा किसी अपने की राह देखती है।
किताब का सफ़ा
सूख गया गुलाब, पर किताब अब भी महकती है,
जैसे तेरी याद, हर सफ़े पर ठहरती है।
गुलाब सूख जाता है, महक नहीं जाती। याद भी ऐसी ही है, जो किसी पन्ने पर ठहर कर हर बार पढ़ने पर लौट आती है।
रेल की खिड़की
हर सफ़र में इक स्टेशन तेरे नाम का आता है,
गाड़ी रुकती नहीं, पर दिल वहीं उतर जाता है।
सफ़र में सैकड़ों स्टेशन गुज़र जाते हैं, पर एक नाम का स्टेशन दिल में उतर कर रुक जाता है, चाहे गाड़ी न रुके।
इनमें आपको कौन सा शेर सबसे अपना लगा? कमेंट में ज़रूर बताइए। और शेर और नज़्में पढ़ने के लिए शायरी और नज़्म में आइए।