नाना पाटेकर: पोस्टर रंगने वाले लड़के से क्रांतिवीर तक, एक आग की दास्तान
75 की उम्र में अलविदा कह गए नाना पाटेकर। पोस्टर रंगने वाले हाथों से परिंदा, क्रांतिवीर और पद्मश्री तक की पूरी दास्तान जानिए।

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा
आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने!
पर्दे पर यह एक बाग़ी की दहाड़ थी, जो भीड़ की आँखों में आँखें डालकर बोली गई थी। यह वो जुमला है जो तीन दशक बाद भी लोगों की ज़बान पर है। नाम तो सुना ही होगा उस आवाज़ का।
पर वक़्त का मिज़ाज देखिए। आज, 8 अक्टूबर 2026 की सुबह, उसी आवाज़ के मालिक की ख़बर आई कि वो हमेशा के लिए ख़ामोश हो गया। गोवा के मणिपाल अस्पताल में सुबह 5:20 बजे मेडिकल टीम ने नाना पाटेकर को मृत घोषित कर दिया। वो 75 साल के थे।
आज फिर लाखों दिल भारी हैं। पर इस बार तमाशा देखने नहीं, शुक्रिया कहने।
मगर एक बात कहूँ, मेरे दोस्त? नाना पाटेकर को सिर्फ़ गरज के नाम से याद करना उनके साथ नाइंसाफ़ी होगी। उस गरज के पीछे एक पोस्टर रंगता बच्चा था, एक बेटा जो बाप की दवाइयों के लिए मंच पर चढ़ता रहा, और एक ऐसा अदाकार जो पर्दे की आग में सचमुच जल गया था।
यह दास्तान उसी आग की है।
कुछ लोग आवाज़ से बड़े होते हैं, और कुछ उस ख़ामोशी से, जो आवाज़ के पीछे पलती है।
तफ़्सीलात
| बात | तफ़्सील |
|---|---|
| पूरा नाम | विश्वनाथ पाटेकर (दुनिया के लिए नाना पाटेकर) |
| जन्म | 1 जनवरी 1951 |
| निधन | 8 अक्टूबर 2026, गोवा |
| उम्र | 75 साल |
| जन्मस्थान | मुरुड-जंजीरा, रायगढ़, महाराष्ट्र |
| पेशा | अभिनेता, निर्देशक |
| परिवार | बेटा मल्हार पाटेकर |
| पहचान | परिंदा, क्रांतिवीर, तिरंगा, अब तक छप्पन, अपहरण, वेलकम |
| सम्मान | तीन राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार, पद्मश्री (2013) |
| आख़िरी फ़िल्म | सूबेदार (2026) |
भूख की पाठशाला
जानिए, कैसे एक बच्चे की हथेलियों पर रंग से पहले भूख की लकीरें खिंचीं।
1 जनवरी 1951 को रायगढ़ ज़िले के मुरुड-जंजीरा में एक बच्चे ने आँखें खोलीं। नाम रखा गया विश्वनाथ पाटेकर। पर यह नाम दुनिया को कभी याद नहीं रहा। वजह? घर की एक छोटी बहन उसे प्यार से “नाना” कहकर बुलाती थी, और वही पुकार आगे चलकर पासपोर्ट से लेकर आधार कार्ड तक उसकी पहचान बन गई।
घर की माली हालत बिगड़ी तो क़रीब 13 साल का वह लड़का स्कूल के बाद लगभग 8 किलोमीटर पैदल चलकर चुनाभट्टी पहुँचता और फ़िल्मी पोस्टर पेंट करता। बदले में महीने के 35 रुपये मिलते और दिन में एक वक़्त का खाना। नाना ने ख़ुद एक इंटरव्यू में कहा था कि उस दौर की भूख और बेइज़्ज़ती ने उन्हें ज़िंदगी और अभिनय, दोनों के बारे में बहुत कुछ सिखाया।
सोचिए ज़रा! जो हाथ बड़े सितारों के पोस्टर रंग रहे थे, वही आगे चलकर उन पोस्टरों पर अपना चेहरा छपवाने वाले थे। बाद में उन्होंने मुंबई के सर जे.जे. इंस्टिट्यूट ऑफ़ अप्लाइड आर्ट में तालीम भी हासिल की।
मंच की रोशनी, बाप की दवाइयाँ और 750 रुपये
सोचिए ज़रा, एक तरफ़ अस्पताल में बीमार बाप, दूसरी तरफ़ मंच की रोशनी।
कहानी जारी है, अगले सफ़े पे