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जगजीत सिंह: जिसने ग़ज़ल को महफ़िलों की क़ैद से आज़ाद कर हर आम दिल तक पहुँचा दिया

बिना टिकट की ट्रेन, पिता की नाराज़गी, बेटे का ग़म और एक अधूरी महफ़िल। जगजीत सिंह की वह दास्तान पढ़िए, जिसने ग़ज़ल को हर दिल तक पहुँचाया।

यौम-ए-वफ़ात पर जगजीत सिंह, हारमोनियम के साथ और पीछे ख़ाली मंच

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा

रात के दो बजे किसी के हेडफ़ोन में अब भी एक आवाज़ चल रही होगी। न कोई शोर, न भारी-भरकम लफ़्ज़, बस सादी-सी धुन और कुछ ऐसे बोल, जो सुनने वाले को अपने ही लगें। कहीं कोई ट्रक ड्राइवर कैसेट पलट रहा होगा, कहीं कोई टूटा हुआ दिल बालकनी में चाय ठंडी कर रहा होगा, और दोनों के बीच एक ही आवाज़ होगी।

यह आवाज़ जगजीत सिंह की है। और हैरत की बात यह है कि इस आवाज़ को सादा बनाए रखने के लिए उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी लगा दी।

ग़ज़ल जब उनके हाथ आई, तब यह विधा चुनिंदा चाहने वालों तक सिमटकर रह गई थी। जगजीत ने ठान लिया कि इसे इतना सादा करेंगे कि यह हर आम घर तक पहुँच जाए। उन्होंने सादी नज़्में चुनीं, सादी धुनें बनाईं, और ग़ज़ल के रंग-ढंग को हमेशा के लिए बदल दिया।

इस आवाज़ का सफ़र शुरू हुआ राजस्थान के श्रीगंगानगर से, जहाँ पैदा हुए एक बच्चे का नाम रखा गया जगमोहन सिंह धीमान, जिसे दुनिया ने जगजीत सिंह बनाकर अपने सीने से लगा लिया। यह दास्तान उसी सफ़र की है, जिसमें बिना टिकट की ट्रेन भी है, पिता की नाराज़गी भी, एक बेटे का ग़म भी, और एक अधूरी रह गई महफ़िल भी।

जो दर्द को सुर में ढाल दे, वह गाता नहीं, इबादत करता है।

तफ़्सीलात

तफ़्सीलमालूमात
पूरा नामजगमोहन सिंह धीमान (जगजीत सिंह)
जन्म8 फ़रवरी 1941
जन्मस्थानश्रीगंगानगर, राजस्थान (तब बीकानेर रियासत)
निधन10 अक्टूबर 2011, मुंबई (70 साल की उम्र में)
पेशाग़ज़ल गायक, संगीतकार
जीवनसाथीचित्रा सिंह (शादी: दिसंबर 1969)
बेटाविवेक (1990 में 20 साल की उम्र में निधन)
पहचानग़ज़ल किंग
मशहूर एल्बमThe Unforgettable (1977), The Latest (1982), Beyond Time (1987)
सम्मानपद्म भूषण (2003), राजस्थान रत्न (2012, मरणोपरांत)

रेत की ज़मीन पर सुरों की पहली सीढ़ी

एक सरकारी सर्वेयर का बेटा गुरुद्वारे के शबदों से ग़ज़ल तक कैसे पहुँचा, यह सफ़र यहीं से शुरू होता है।

8 फ़रवरी 1941 को राजस्थान के श्रीगंगानगर में, जो उस वक़्त बीकानेर रियासत का हिस्सा था, एक नामधारी सिख घर में एक बच्चे की किलकारी गूँजी। सात भाई-बहनों में से एक इस बच्चे का नाम रखा गया जगमोहन। पिता सरदार अमर सिंह धीमान सरकारी महकमे में सर्वेयर थे।

कहा जाता है कि नामधारी गुरु की सलाह पर पिता ने बेटे का नाम बदलकर जगजीत रख दिया, और गुरु ने भविष्यवाणी की थी कि यह बच्चा एक दिन दुनिया जीत लेगा। पिता को क्या पता था कि यह भविष्यवाणी लफ़्ज़ों में नहीं, सुरों में सच होगी।

नन्हा जगजीत गुरुद्वारों में शबद गाता और गुरुपर्व के जुलूसों में अपनी आवाज़ बिखेरता। पिता ने बेटे का हुनर पहचान लिया और तालीम के लिए उसे नेत्रहीन उस्ताद पंडित छगनलाल शर्मा के हवाले किया, फिर उस्ताद जमाल ख़ान के। ख़याल, ध्रुपद, ठुमरी, हर रंग की बारीकी यहीं से आई।

कहानी जारी है, अगले सफ़े पे