नाना पाटेकर: पोस्टर रंगने वाले लड़के से क्रांतिवीर तक, एक आग की दास्तान
75 की उम्र में अलविदा कह गए नाना पाटेकर। पोस्टर रंगने वाले हाथों से परिंदा, क्रांतिवीर और पद्मश्री तक की पूरी दास्तान जानिए।

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा
नाना ने एक भावुक इंटरव्यू में बताया था कि उनके पिता अस्पताल में भर्ती थे और इलाज के पैसे नहीं थे। पिता की दवाइयों के लिए वो नाटक करते रहे। एक तरफ़ बाप की हालत, दूसरी तरफ़ मंच पर जाकर किसी और का किरदार बन जाना। शायद यहीं से उनकी अदाकारी में वो सच्चाई आई, जिसे नक़ली आँसू कभी नहीं छू पाते।
फिर आया साल 1978। थिएटर कलाकार नीलकांती से शादी हुई और पूरा ख़र्च आया सिर्फ़ 750 रुपये। नीलकांती तब बैंक में अफ़सर थीं और तनख़्वाह थी 2500 रुपये महीना, जबकि नाना को एक शो के मिलते थे महज़ 50 रुपये। और उसी साल, 1978 में, पर्दे पर पहला क़दम पड़ा फ़िल्म ‘गमन’ के साथ।
शुरुआती किरदार उन्हें फ़ौरन स्टार नहीं बना सके। मगर उनके अभिनय की संजीदगी और अलग अंदाज़ ने फ़िल्मकारों का ध्यान खींचना शुरू कर दिया था।
जो आदमी ग़रीबी में भी किरदार निभाना सीख लेता है, उसे आगे कोई किरदार छोटा नहीं लगता।
वो ज़ख़्म जो कैमरे के पीछे रहा
हर गरजने वाले के भीतर कहीं एक ख़ामोश कमरा होता है।
नाना के बड़े बेटे का बचपन में ही, महज़ ढाई साल की उम्र में, इंतक़ाल हो गया। इस सदमे ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया। बाद में छोटे बेटे मल्हार के आने से ज़िंदगी में दोबारा ख़ुशियाँ लौटीं। मल्हार ने अभिनय के बजाय फ़िल्म निर्माण और निर्देशन का रास्ता चुना।
पर्दे का यह सख़्त आदमी अपने इस दर्द पर बाद के बरसों में बड़ी बेबाकी से बोला, बिना किसी नक़ाब के। शायद इसीलिए उसके ग़ुस्से में भी एक इंसानी नमी महसूस होती थी।
जब आग असली हो गई
जानिए, वो सीन जिसने एक अदाकार को सचमुच जला दिया, और एक स्टार को जन्म दिया।
साल 1989। फ़िल्म ‘परिंदा’। क्लाइमैक्स का आग वाला सीन असली आग के साथ शूट किया गया। नाना के मुताबिक़, वो सचमुच आग की चपेट में आ गए। त्वचा, दाढ़ी, मूँछ, भौंहें और पलकें तक जल गईं। क़रीब 60 दिन अस्पताल में रहना पड़ा और लगभग छह महीने आराम।
फिर भी… जब पर्दे पर वो गैंगस्टर उतरा, तो दर्शक और समीक्षक, दोनों हिल गए। इस किरदार के लिए उन्हें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार और फ़िल्मफ़ेयर, दोनों में सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता का सम्मान मिला। इसके बाद नब्बे के दशक में वो हिंदी सिनेमा के सबसे चर्चित और भरोसेमंद अदाकारों में गिने जाने लगे।
जिस आग ने उन्हें जलाया, उसी आग ने उन्हें रोशन कर दिया।
वर्दी का जुनून
जानिए, क्यों एक अभिनेता ने वर्दी को सिर्फ़ किरदार नहीं समझा।
साल 1991 में आई ‘प्रहार: द फ़ाइनल अटैक’ से नाना ने निर्देशन में क़दम रखा। अभिनय के साथ लेखन और निर्देशन की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं के कंधों पर थी। फ़ौजी का रोल निभाने के लिए उन्होंने भारतीय सेना के साथ कड़ा सैन्य प्रशिक्षण लिया।
कहानी जारी है, अगले सफ़े पे