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नाना पाटेकर: पोस्टर रंगने वाले लड़के से क्रांतिवीर तक, एक आग की दास्तान

75 की उम्र में अलविदा कह गए नाना पाटेकर। पोस्टर रंगने वाले हाथों से परिंदा, क्रांतिवीर और पद्मश्री तक की पूरी दास्तान जानिए।

नाना पाटेकर: असली आग से राष्ट्रीय पुरस्कार तक

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा

यह सिर्फ़ किरदार की तैयारी नहीं थी, यह एक रिश्ते की शुरुआत थी। नाना ने बताया था कि 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडिस से इजाज़त लेकर क़रीब 60 दिन जवानों के साथ बिताए। ऑपरेशन से जुड़ी जानकारी साझा करने से उन्होंने इनकार कर दिया। कुछ बातें पर्दे पर नहीं, ख़ामोशी में रखी जाती हैं।

क्रांतिवीर: जब मुल्क ने उनकी दहाड़ सुनी

जानिए, वो फ़िल्म जिसने नाना को राष्ट्रीय पुरस्कार भी दिया और हर ज़बान पर जुमले भी।

फिर आया 1994 और साथ आई ‘क्रांतिवीर’। इस फ़िल्म के लिए नाना को राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता चुना गया। फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर भी बड़ी कामयाबी बनी और उस साल की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फ़िल्मों में शामिल हुई।

और वही जुमला, “आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने”, जिससे हमने यह दास्तान शुरू की थी, इसी फ़िल्म का है। इसी फ़िल्म का एक और सीन है, जहाँ वो भीड़ के सामने ख़ून दिखाकर पूछते हैं कि बता, इसमें हिंदू का कौन-सा है और मुसलमान का कौन-सा। यह सवाल आज भी उतना ही चुभता है।

पर नाना को किसी एक साँचे में रखना नामुमकिन था। ‘अंगार’ में नकारात्मक किरदार, ‘तिरंगा’, ‘खामोशी: द म्यूज़िकल’, ‘शक्ति: द पावर’, ‘अब तक छप्पन’, ‘राजनीति’, हर जगह एक नया रंग। ‘अग्निसाक्षी’ के लिए उन्हें एक बार फिर राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, इस बार सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता का। और 2005 की ‘अपहरण’ में उनके खलनायकी वाले अंदाज़ को फ़िल्मफ़ेयर समेत कई पुरस्कारों ने सलाम किया। परिंदा, क्रांतिवीर, अग्निसाक्षी, तीन फ़िल्में, तीन राष्ट्रीय पुरस्कार।

उदय शेट्टी की हँसी

सोचिए ज़रा, जिस आदमी की आवाज़ से हॉल काँपते थे, उसी ने पूरे मुल्क को हँसा दिया।

2007 में आई ‘Welcome (वेलकम)’ और नाना बन गए Uday Shetty (उदय शेट्टी)। वही गंभीर, वही सख़्त चेहरा, मगर इस बार उसी सख़्ती से कॉमेडी निकली। दर्शकों ने उदय शेट्टी को इतना सिर माथे बिठाया कि ‘वेलकम बैक’ में भी वही किरदार लौटा। उसी महफ़िल के एक और नगीने, बल्लू बने मुश्ताक़ ख़ान, की दास्तान भी हमने आपको सुनाई है।

यही नाना की ख़ूबी थी। उन्होंने साबित किया कि असली अदाकार वो है जो ग़ुस्से से भी हँसा सके और हँसी से भी रुला सके।

मंच, मिट्टी और मराठी की शान

जानिए, पर्दे से उतरकर यह आदमी कहाँ मिलता था।

मराठी सिनेमा में नाना का योगदान बेहद अहम रहा। ‘नटसम्राट’ में उनके अभिनय को ख़ूब सराहा गया और उन्हें मराठी फ़िल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का सम्मान भी मिला। साल 2013 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से नवाज़ा।

कहानी जारी है, अगले सफ़े पे