होम / अमर हस्तियाँ / दिलीप कुमार: जिसकी एक ख़ामोशी पर आज भी पूरा बॉलीवुड अदब से सर झुकाता है
अमर हस्तियाँ

दिलीप कुमार: जिसकी एक ख़ामोशी पर आज भी पूरा बॉलीवुड अदब से सर झुकाता है

हिंदुस्तानी सिनेमा का सबसे बड़ा अदाकार, जिसने अपने ही गम से हारकर भी आठ फ़िल्मफेयर अवॉर्ड जीते। पढ़िए दिलीप कुमार की पूरी दास्तान।

दिलीप कुमार: आठ ट्रॉफ़ियाँ, एक टूटा दिल, और एक अमर विरासत

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा

सोचिए ज़रा, एक फल बेचने वाला लड़का, जिसकी न कभी एक्टिंग सीखने की तमन्ना थी, ना कोई तालीम, अचानक बॉम्बे टॉकीज़ की मालकिन देविका रानी की नज़र में आ जाता है, और उसी दिन से हिंदुस्तानी सिनेमा का सबसे बड़ा नाम गढ़ना शुरू होता है। 1943 में देविका रानी ने यूसुफ़ की उर्दू ज़बान और शख़्सियत से मुतास्सिर होकर उन्हें काम की पेशकश की, और एक नया नाम दिया, दिलीप कुमार। 1944 में “ज्वार भाटा” से डेब्यू हुआ, फ़िल्म बुरी तरह पिटी। मगर 1947 की “जुगनू” ने पहली बार दिलीप कुमार को बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाबी दिलाई। और 1949 की “अंदाज़”, नरगिस और राज कपूर के साथ, वो फ़िल्म बनी जिसने दिलीप कुमार को स्टार बना दिया।

ट्रेजेडी किंग, एक ख़िताब जो बोझ बन गया

“दीदार”, “दाग़”, “देवदास”, एक के बाद एक, दिलीप कुमार ने ऐसे किरदार निभाए जिनमें नायक हारता था, टूटता था, मर जाता था। उनका अभिनय इतना असरदार था कि पूरा हिंदुस्तान उन्हें “ट्रेजेडी किंग” पुकारने लगा। ये वो दौर था जब उन्होंने पश्चिमी सिनेमा से पहले ही, हिंदुस्तानी सिनेमा में एक ख़ामोश, नैचुरल अंदाज़-ए-बयां ईजाद किया, जिसे बाद में “मेथड एक्टिंग” कहा गया।

मगर इस ख़िताब की क़ीमत चुकानी पड़ी। इतने गहरे किरदारों में डूबते-डूबते, दिलीप कुमार ख़ुद डिप्रेशन के शिकार हो गए। उन्होंने ख़ुद एक इंटरव्यू में कहा था कि ऐसी ट्रेजेडी उनके “नर्वस सिस्टम के लिए एक सज़ा” बन गई थी। एक मनोचिकित्सक की सलाह पर उन्होंने हल्के-फुल्के रोल करने शुरू किए, “आन” (1952) से, जो उनकी पहली टेक्नीकलर फ़िल्म भी थी, फिर “आज़ाद” और “कोहिनूर” जैसी कॉमेडी से।

माधुबाला, नौ साल का इश्क़, एक अदालत में टूटा

1951 में “तराना” के सेट पर दिलीप कुमार की मुलाक़ात माधुबाला से हुई। नौ साल तक चला ये इश्क़ इतना गहरा था कि सगाई तक बात पहुँची, दिलीप कुमार की बहन ख़ुद चुन्नी लेकर आईं। साथ में “संगदिल”, “अमर” और “मुग़ल-ए-आज़म” जैसी फ़िल्में भी कीं।

मगर 1956-57 में बी.आर. चोपड़ा की “नया दौर” के दौरान एक अदालती लड़ाई ने सब बदल दिया। माधुबाला के पिता ने भोपाल के आउटडोर शूट पर जाने से मना किया, चोपड़ा ने अनुबंध तोड़ने का मुक़दमा दायर कर दिया। दिलीप कुमार ने अदालत में चोपड़ा के पक्ष में गवाही दी, माधुबाला और उनके पिता के ख़िलाफ़। नौ साल का रिश्ता उसी अदालती कमरे में दम तोड़ गया। इसी फ़िल्म “नया दौर” के लिए दिलीप कुमार को अपना तीसरा फ़िल्मफ़ेयर बेस्ट एक्टर अवॉर्ड भी मिला, एक अजीब इत्तेफ़ाक़ जिसमें जीत और टूटन साथ-साथ आए।

आठ ट्रॉफ़ियाँ, एक रिकॉर्ड

कहानी जारी है, अगले सफ़े पे