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अमर हस्तियाँ

माधुबाला: जिसकी एक झलक पर आज भी हज़ारों दिल धड़क उठते हैं

बॉलीवुड की सबसे ख़ूबसूरत मगर सबसे तनहा अभिनेत्री, जिसका दिल पर्दे पर धड़कता रहा और हक़ीक़त में टूटता रहा। जानिए माधुबाला की पूरी दास्तान।

माधुबाला: हुस्न ऐसा कि आज भी हर नौजवान दिल उसी की धड़कन पर जीता है

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा

वो 1959 की एक शाम थी। बॉम्बे के एक स्टूडियो में शीशों से घिरा एक महल बनाया गया था, जहाँ हर दीवार, हर छत, हर कोना रौशनी को हज़ार टुकड़ों में तोड़कर वापस फेंक रहा था। उसी रौशनी के बीच एक औरत खड़ी थी, सर उठाए, आँखों में बग़ावत लिए, जैसे दुनिया की सबसे बड़ी सल्तनत को चुनौती दे रही हो।

कैमरा रुकता, और वो गिर जाती। कभी थकान से, कभी साँस की कमी से। यूनिट के लोग उसे सम्भालते, पानी देते, कुछ देर रुकते, और फिर वही औरत उठकर वापस उसी शीशमहल में लौट जाती, वही बग़ावत भरी मुस्कान लिए, जैसे कुछ हुआ ही ना हो।

दुनिया इस औरत को जानती थी एक नाम से, ऐसा नाम जो ख़ुद “शहद” का मतलब रखता था। पर्दे पर वो हिंदुस्तान की सबसे ख़ूबसूरत औरत थी, जिसकी एक मुस्कान पर लाखों दिल धड़कते थे। हक़ीक़त में, उसी औरत का अपना दिल एक छेद लिए हुए था, ऐसा राज़ जो सिर्फ़ चंद क़रीबी लोग जानते थे।

ये किसी फ़िल्म का सीन नहीं था। ये माधुबाला की ज़िंदगी का एक आम दिन था, “मुग़ल-ए-आज़म” के सेट पर।

हुस्न वो नक़ाब है जो सबसे बड़े दर्द को भी मुस्कुराहट में छुपा लेता है।

ये कहानी है मुमताज़ जहाँ बेगम देहलवी की, जिसे दुनिया माधुबाला के नाम से जानती है। 36 साल की छोटी सी ज़िंदगी, 72 फ़िल्में, एक अधूरा इश्क़, एक अधूरी शादी, और एक ऐसी विरासत जो पाँच दशक बाद भी उतनी ही ज़िंदा है।

तफ़्सीलात

तफ़्सीलमालूमात
पूरा नाममुमताज़ जहाँ बेगम देहलवी
जन्म14 फ़रवरी 1933, दिल्ली, ब्रिटिश भारत
निधन23 फ़रवरी 1969 (उम्र 36 वर्ष), बॉम्बे
मूलपेशावर घाटी के यूसुफ़ज़ई पठान परिवार से
पेशाअभिनेत्री, निर्माता
सक्रिय वर्ष1942 से 1964 (72 से ज़्यादा फ़िल्में)
परिवारपिता अताउल्लाह ख़ान, 11 भाई-बहनों में पाँचवीं, पति किशोर कुमार (विवाह 1960)
पहचान“बॉलीवुड की वीनस”, मुग़ल-ए-आज़म की अनारकली
अवॉर्ड्सकरियर में सिर्फ़ एक फ़िल्मफ़ेयर नामांकन (1961), कोई जीत नहीं

आग़ाज़ | बचपन की जद्दोजहद

अताउल्लाह ख़ान पेशावर घाटी के एक यूसुफ़ज़ई पठान थे, इम्पीरियल टोबैको कम्पनी में नौकरी करते थे। नौकरी छूटी, तो परिवार पहले दिल्ली आया, फिर बॉम्बे। ग्यारह बच्चों में मुमताज़ पाँचवीं थीं, और शुरुआती बरसों में ही दो छोटे भाइयों की मौत ने घर पर एक गहरा ज़ख़्म छोड़ दिया था।

नौ साल की उम्र में मुमताज़ ने “बसंत” (1942) में एक बाल कलाकार के तौर पर पहली बार कैमरे का सामना किया। घर की माली हालत ऐसी थी कि जल्द ही यही बच्ची पूरे परिवार की इकलौती कमाने वाली बन गई। स्कूल कभी नहीं गईं, घर पर ही एक अंग्रेज़ी टीचर से पढ़ाई की। बचपन का मतलब उनके लिए फ़िल्म सेट और कैमरे की रौशनी था, खेल-कूद नहीं।

एक नाम, एक सितारा

कहानी जारी है, अगले सफ़े पे