दर-ए-इश्क़: मोहब्बत और खौफ़ की दास्तान
लखनऊ की रहस्यमयी हवेली, सुर्खाब की रूह और आशेर की मोहब्बत की ऐसी दास्तान, जहां इश्क़ और खौफ़ आमने-सामने खड़े हैं।

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा
आशेर ने अपनी पूरी ताकत जुटाई और आयतों को जोर से पढ़ता रहा। हर बार जब वह एक आयत पढ़ता, परछाई थोड़ा पीछे हटती।
लेकिन फिर परछाई ने चाल बदली। उसने हवा में सुर्खाब का चेहरा दिखाया। वह रो रही थी, और मदद की गुहार लगा रही थी। “आशेर, मुझे बचाओ! यह परछाई मुझे निगल रही है।”
आशेर का दिल पसीज गया।
“मोहब्बत सिर्फ़ अल्फ़ाज़ों से नहीं होती, आशेर,” परछाई गहरी हंसी के साथ बोली। “तुम इसे बचाने की कोशिश कर रहे हो, लेकिन तुम्हारे अंदर हिम्मत नहीं है। तुम मेरी तरह इसे छोड़कर भाग जाओगे।”
रूह और मोहब्बत मोहब्बत की नई शुरुआत
आशेर ने खुद को शांत किया। उसने अपनी जेब से वह तावीज़ निकाली, जो मौलवी साहब ने उसे दी थी। तावीज़ को अपने हाथ में लेकर उसने परछाई की ओर देखा। उसको मौलवी साहब की बात याद थी की अगर उसके दिल में ज़रा भी शुबहा हुई तो इस तावीज़ की ताक़त से वह भी मर सकता है। पर आशेर को अपनी मोहब्बत पे यकीन था।
आशेर ने कहा “तुमने सुर्खाब के साथ धोखा किया। लेकिन मैं अपनी मोहब्बत पर कुर्बान हो जाऊंगा। तुम मेरे इरादे को तोड़ नहीं सकते!”
उसने तावीज़ को उठाकर परछाई की तरफ फेंका। जैसे ही तावीज़ परछाई से टकराई, एक ज़ोरदार चमक फैल गई। परछाई ने चीख मारते हुए अपने आकार को खोना शुरू कर दिया। हवाएं तेज़ हो गईं, लेकिन आयतों और तावीज़ की ताकत ने उसे कमजोर कर दिया।
परछाई ने अपने आखिरी शब्दों में कहा, “यह जंग अभी खत्म नहीं हुई, इंसान। मोहब्बत और नफरत के बीच जंग हमेशा चलती रहेगी।” और फिर वह धुएं में विलीन हो गई।
जैसे ही परछाई गायब हुई, कमरे की लाल रोशनी फीकी पड़ने लगी। क्रिस्टल टूटकर रोशनी के हजारों टुकड़ों में बदल गया। उसी रोशनी में सुर्खाब की रूह प्रकट हुई।
वह अब शांत और खूबसूरत थी। उसने आशेर की ओर देखा और कहा, “तुमने अपनी मोहब्बत से मुझे आज़ाद कर दिया। मैं हमेशा तुम्हारे इस एहसान को याद रखूंगी। लेकिन मेरी रूह अब तुम्हारी रूह से बंध चुकी है। मैं तुम्हारे साथ हूँ, आशेर। हमेशा के लिए।”
"तू रूह में बसी है, अब कहीं और न जाऊँगा,
मोहब्बत के दरिया में तेरे संग बह जाऊँगा।
इश्क़ ने खौफ़ को हराया है आज,
तुझे पा कर अपनी तक़दीर पर इतराऊँगा।"
कहानी जारी है, अगले सफ़े पे