दर-ए-इश्क़: मोहब्बत और खौफ़ की दास्तान
लखनऊ की रहस्यमयी हवेली, सुर्खाब की रूह और आशेर की मोहब्बत की ऐसी दास्तान, जहां इश्क़ और खौफ़ आमने-सामने खड़े हैं।

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा
जैसे ही सुर्खाब की रूह आज़ाद हुई, उसने आशेर के पास जाकर कहा, “तुमने मुझे आज़ाद कर दिया, लेकिन अब मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जा सकती। तुमने अपनी रूह से मुझे बांध लिया है। अब मैं तुम्हारे साथ हमेशा रहूंगी।”
आशेर के हाथों से शीशा गिर पड़ा। वह बेहोश होकर ज़मीन पर गिर गया। यूसुफ़ ने उसे खींचकर हवेली से बाहर निकाला।
जब आशेर ने अपनी आंखें खोलीं, तो उसने एक चमकदार रौशनी को अपने अंदर दाखिल होते हुए देखा। वह रौशनी सुर्खाब की रूह थी जो अब उसकी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी थी। वह उसे हर वक्त महसूस कर सकता था। उसकी आवाज़, उसकी मौजूदगी, और उसकी मोहब्बत – सब कुछ उसकी रूह में समा चुका था। इश्क़ जब रूह में उतर जाए, तो उसकी गहराई में खौफ़ भी मोहब्बत जैसा ही खूबसूरत लगने लगता है।
पर क्या मोहब्बत हर दहशत को जीत सकती है? क्या यह मोहब्बत का अंजाम था? या फिर ये सिर्फ़ एक नई दास्तान की शुरुआत है? नहीं, इश्क़ और कुर्बानी का यह सफर अभी खत्म नहीं हुआ… यह सफर तो अभी और आगे जाने वाला था। आशेर की यह कुर्बानी इस किस्से का आखिर नहीं था।
"मोहब्बत में जीना भी है, मर जाना भी है,
हर इश्क़ का मुकाम दीवाना भी है।
तेरे लिए रूह तक की कुर्बानी दूँ,
ये इश्क़ का वादा है, अफ़साना भी है।"
जंग-ए-ज़िन्दगी!
आशेर अब हवेली से तो बाहर आ चुका था, लेकिन हवेली की सिहरन और सुर्खाब की मौजूदगी उसके दिल और रूह में गहराई तक उतर चुकी थी। हर रात जब वह सोने की कोशिश करता, उसकी बंद आंखों के सामने सुर्खाब का चेहरा तैरने लगता। उसकी आवाज़ उसकी सांसों में गूंजती, और कहती
"तुम्हारी मोहब्बत ने मुझे बचा तो लिया, लेकिन तुम्हारी रूह ने हवेली को नहीं छोड़ा। जब तक तुम इसे नहीं समझोगे, हमारी मोहब्बत अधूरी रहेगी।"
यूसुफ़, जो अब आशेर के साथ था, इस बदलाव से परेशान था।
“आशेर, मैं तुम्हें वापस उस जिंदगी में देखना चाहता हूँ, जो तुम्हारी थी। ये हवेली, ये रूह और ये मोहब्बत – ये सब तुम्हारे लिए नहीं है।”
लेकिन आशेर का जवाब हमेशा वही होता:
“यूसुफ़, मोहब्बत का रास्ता इतना आसान नहीं होता। जब दिल से आवाज़ आती है, तो इंसान किसी भी मंज़िल की परवाह नहीं करता।”
युसूफ परेशां था पर वह क्या कर सकता था।
आशेर तो अपनी दुनियाँ में मशगूल था, वह खुद से सवाल करता:
"क्या मैंने अपनी मोहब्बत को आज़ाद किया, या खुद को उसकी कैद में डाल दिया?"
आशेर की जिंदगी अब एक नई जंग थी। वह मोहब्बत और हवेली के रहस्य के बीच फंसा था। क्या वह सुर्खाब को हमेशा के लिए अपना बना पाएगा या हवेली का शाप उसके प्यार की राह में फिर से खड़ा होगा?
इश्क़ का आखिरी इम्तिहान
कहानी जारी है, अगले सफ़े पे