दर-ए-इश्क़: मोहब्बत और खौफ़ की दास्तान
लखनऊ की रहस्यमयी हवेली, सुर्खाब की रूह और आशेर की मोहब्बत की ऐसी दास्तान, जहां इश्क़ और खौफ़ आमने-सामने खड़े हैं।

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा
अचानक, सामने की सीढ़ियों पर एक परछाईं उभरी। टॉर्च की रोशनी जैसे ही उस पर पड़ी, वह धीरे-धीरे साफ हो गई। वह एक लड़की थी। सफेद लिबास में लिपटी, मानो खुद चांदनी उसे ओढ़ा दी गई हो। उसके लंबे काले बाल उसकी पीठ पर बहते पानी की तरह लहरा रहे थे, और उसकी आंखें… उसकी आंखें ऐसी थीं जैसे उनमें किसी अनसुने दर्द की नदी बह रही हो।
आशेर ने घबराते हुए पूछा, “तुम कौन हो?”
उसने अपने होंठों पर हल्की मुस्कान लाते हुए कहा, “मैं सुर्खाब हूँ। ये हवेली मेरी है। पर तुम यहां क्यों आए हो?”
उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो सीधे दिल में उतर गया। यह आवाज़ न तो सख्त थी, न ही पूरी तरह नरम। यह मोहब्बत और खौफ का एक अजीब मिश्रण थी। सुर्खाब कि मुस्कान में कुछ ऐसा था जो आशेर को अपनी ओर खींच रहा था। यूसुफ़ ने आशेर को रोकने की कोशिश की, लेकिन उसका ज़ोर न चला ।
"तेरी आंखों में डूबने की ख्वाहिश है,
मोहब्बत के समंदर का तू किनारा है।
ये दिल समझे तुझे ख्वाब की तरह,
पर तेरी हकीकत खौफ़ से भरा है।"
“मैंने सुना था कि यह जगह खौफनाक है। लेकिन मुझे डर नहीं लगता। मैं सच्चाई देखना चाहता था।”
“सच्चाई?” सुर्खाब मुस्कुराई। “सच्चाई हमेशा इतनी आसान नहीं होती। लेकिन अगर तुम इसे देखना चाहते हो, तो आओ।”
यूसुफ़ ने तुरंत आशेर का हाथ पकड़ लिया। “नहीं, आशेर! यह ठीक नहीं है। हमें यहां से जाना चाहिए।”
लेकिन इससे पहले कि यूसुफ़ उसे खींच पाता, सुर्खाब ने अपने हाथ से इशारा किया। यूसुफ़ के कदम जड़ हो गए, मानो किसी पोशीदह ताकत ने उसे एक पत्थर बना दिया हो।
“तुम मेरे मेहमान हो,” सुर्खाब ने आशेर से कहा। “लेकिन मेरे करीब आने की कोशिश मत करना। और हाँ, सच्चाई अक्सर खौफनाक होती है। क्या तुम इसे सहने के लिए तैयार हो?”
आशेर उसकी मुस्कान में कैद हो गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि यह मोहब्बत का असर था या किसी रहस्यमय ताकत का।
“मैं सच्चाई से भागने वालों में से नहीं हूँ,” आशेर ने कहा।
“काफी वक़्त के बाद किसी आदमज़ात में इतनी हिम्मत देखीं हैं मैंने, वरना यहाँ कितने आये और कितने गए, मुझे तो याद भी नहीं। ख़ैर.. अगर तुम इसे देखना चाहते हो, तो आओ,” सुर्खाब ने कहा, और अपनी उंगलियों के हल्के इशारे से सीढ़ियों की ओर इशारा किया।
गुलाब और राख का सच
सुर्खाब आगे बढ़ी, उसका सफेद लिबास सीढ़ियों के अंधेरे में चमकता हुआ महसूस हो रहा था। आशेर ने देखा कि उसकी चाल में एक अजीब-सी रवानगी थी, मानो वह ज़मीन पर नहीं चल रही हो।
सीढ़ियों से नीचे उतरते ही माहौल और ठंडा हो गया। फर्श पर जमी धूल की मोटी परत के बावजूद, उनके कदमों की आवाज़ गूंज रही थी। चारों तरफ अंधेरा घना हो रहा था, और दीवारों पर अजीब तसवीरें बन रही थीं, जो कभी इंसान की शक्ल लगतीं और कभी धुंआ बनकर गायब हो जातीं।
कहानी जारी है, अगले सफ़े पे