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दर-ए-इश्क़: मोहब्बत और खौफ़ की दास्तान

लखनऊ की रहस्यमयी हवेली, सुर्खाब की रूह और आशेर की मोहब्बत की ऐसी दास्तान, जहां इश्क़ और खौफ़ आमने-सामने खड़े हैं।

दर-ए-इश्क़ की कहानी में रहस्यमयी हवेली, सुर्खाब की रूह और आशेर

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा

सुर्खाब मुस्कुराई, लेकिन उसकी मुस्कान के पीछे उदासी का साया था। “तो फिर शीशे में देखो, और जानो कि मोहब्बत की राह में हर कदम मौत के करीब ले जाता है।”

आशेर ने कांपते हुए शीशे को अपने हाथों में उठाया। जैसे ही उसने उसमें झांका, शीशे की सतह पर धुंध सी छा गई। वह धीरे-धीरे साफ होने लगी, और उसमें वह खुद को देख सकता था। लेकिन यह सिर्फ़ उसका अक्स नहीं था। शीशे में उसके पीछे सुर्खाब खड़ी थी। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे, लेकिन उसके होंठ मुस्कुरा रहे थे।

“ये क्या है?” आशेर ने हैरानी से पूछा।
सुर्खाब ने गहरी सांस ली। “यह मेरी मोहब्बत की आखिरी तस्वीर है। जिस इंसान से मैंने मोहब्बत की थी, उसने मुझसे यहीं इस शीशे के सामने मुझे अकेला छोड़ा था और मुझे धोखा दिया। इसी कमरे में मैं सिसकते हुवे खत्म हो गयी और मेरी रूह इस शीशे में समां गयी। उसने मुझे इस शीशे में कैद छोड़ दिया। और जब तक कोई सच्ची मोहब्बत से इस शीशे को कुर्बानी नहीं देता, मेरी रूह कभी आज़ाद नहीं होगी।”

शीशे में अचानक एक जलता हुआ मंजर उभरने लगा। हवेली की दीवारें जल रही थीं। चीखें और कराहें हवा में गूंजने लगीं। आशेर ने देखा कि सुर्खाब एक आग के घेरे में खड़ी थी।

“अगर मैं तुम्हें बचाने की कोशिश करता, तो क्या मैं मर जाऊंगा?” आशेर ने पूछा।
“मोहब्बत में मौत नहीं होती, आशेर। बस रूह का एक नया सफर शुरू होता है। लेकिन इस सफर की कीमत खून है। अगर तुम मुझे चाहते हो, तो अपनी रगों से बहते खून की बूंदें इस शीशे पर गिरानी होंगी।”

यूसुफ़ ने कमरे के कोने से चिल्लाते हुए कहा, “आशेर! मत करो ये! ये तुम्हें धोखा दे रही है। ये मोहब्बत नहीं, ये मौत है!”
लेकिन आशेर ने यूसुफ़ की तरफ नहीं देखा, और उसकी आवाज़ जैसे हवेली की गूंज में खो गई। आशेर नजरें सुर्खाब पर थीं।
“सुर्खाब, तुमने अपनी मोहब्बत में धोखा सहा है। लेकिन मैं तुम्हारे लिए वफादार रहूंगा। अगर मेरी जान तुम्हें आज़ाद कर सकती है, तो ये जान तुम्हारी है।”

आशेर ने अपने हाथ में एक कांच का टुकड़ा उठाया। “रुको!” सुर्खाब ने चीखते हुए कहा। “सोच लो, ये सिर्फ़ मेरी रूह की आज़ादी नहीं है। ये तुम्हारी रूह को भी मुझसे बांध देगा। क्या तुम इसे समझते हो?”
“मोहब्बत सिर्फ आज़ादी नहीं, बंधन भी है, सुर्खाब। और अगर ये बंधन तुम्हारे साथ है, तो मैं इसे खुशी से कुबूल करता हूँ।”

आशेर ने अपनी कलाई पर कांच का टुकड़ा फेर दिया। खून की गर्म बूंदें शीशे पर गिरीं। उसी पल, हवेली की दीवारें कांपने लगीं। झूमर टूटकर गिर पड़े, और हवा में एक जोरदार चीख गूंज उठी।

शीशे से धुंआ उठने लगा, और सुर्खाब की रूह धीरे-धीरे रोशनी में बदलने लगी। उसका चेहरा अब सुकून और मोहब्बत से दमक रहा था।

कहानी जारी है, अगले सफ़े पे