होम / एक किस्त, एक दास्तान / दर-ए-इश्क़: मोहब्बत और खौफ़ की दास्तान
एक किस्त, एक दास्तान

दर-ए-इश्क़: मोहब्बत और खौफ़ की दास्तान

लखनऊ की रहस्यमयी हवेली, सुर्खाब की रूह और आशेर की मोहब्बत की ऐसी दास्तान, जहां इश्क़ और खौफ़ आमने-सामने खड़े हैं।

दर-ए-इश्क़ की कहानी में रहस्यमयी हवेली, सुर्खाब की रूह और आशेर

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा

एक रात, हवेली के अंदर जब हवाएं तेज़ हो रही थीं और दीवारें जैसे कराह रही थीं, सुर्खाब ने आशेर से कहा,
“आशेर, तुम मुझे आज़ाद कर सकते हो। लेकिन यह आसान नहीं होगा। तुम्हें अपने दिल की सच्चाई साबित करनी होगी।”
“कैसे?”
“तुम्हें मेरे माज़ी के खौफ का सामना करना होगा। मेरी रूह का एक टुकड़ा अब भी इस हवेली में कैद है। उसे पाने के लिए तुम्हें सबसे बड़ी सच्चाई और सबसे बड़े खौफ का सामना करना होगा।”

“मैं तुम्हारे लिए सब कुछ करूंगा, सुर्खाब।” आशेर ने उसकी आंखों में झांकते हुए कहा।
“लेकिन याद रखना,” सुर्खाब ने धीरे से कहा, “यह सिर्फ तुम्हारी मोहब्बत का इम्तिहान नहीं है। यह तुम्हारी रूह का भी इम्तिहान है।”

आशेर अब एक ऐसे सफर पर था, जहां मोहब्बत और खौफ का खेल और गहरा होने वाला था। हवेली के अंदर का हर कोना, हर दीवार और हर परछाई उसके इम्तिहान का हिस्सा बनने को तैयार थी। लेकिन क्या वह इस खौफ को पार कर पाएगा? और क्या उसकी मोहब्बत सुर्खाब को उस कैद से आज़ाद कर सकेगी, जो माज़ी के जख्मों ने उसे दी थी?

मोहब्बत का इम्तिहान! मोहब्बत में जीना भी है, मर जाना भी है

उस रात, हवेली में अजीब हलचल थी। दीवारों पर खून की लकीरें उभर रही थीं, और हवेली की फिजा में किसी की कराहें गूंज रही थीं। हवेली की दीवारें उस रात जैसे सांस ले रही थीं। हर कोना एक जिंदा कहानी सुनाने को बेताब था। दीवारों से अजीब आवाज़ें आने लगीं, और कमरे में अंधेरा और ठंडक बढ़ गई। सुर्खाब ने आशेर से कहा, “अगर तुम मुझे सच्चे दिल से चाहते हो, तो मुझे आज़ाद करो। मेरी रूह इस कैद से निकलना चाहती है। लेकिन इसके लिए तुम्हें अपनी जान दांव पर लगानी होगी।”

सुर्खाब की मोहब्बत में आशेर ने फैसला कर लिया। उसने सुर्खाब से कहा, “अगर मेरी ज़िन्दगी तुम्हें सुकून दे सकती है, तो मैं इसके लिए तैयार हूँ।”

सुर्खाब आशेर को एक कमरे में ले गयी। कमरे के बीचों-बीच खड़ा आशेर, अपनी धड़कनों की गूंज साफ़ सुन सकता था। उसके सामने ज़मीन पर रखा एक पुराना, अजीब शीशा चमक रहा था, जिस पर धुंधली परछाइयां थिरक रही थीं। सुर्खाब का चेहरा गंभीर था, लेकिन उसकी आंखों में मोहब्बत का समंदर लहरें मार रहा था।

“आशेर,” उसने गहरी आवाज़ में कहा, “यह शीशा सिर्फ़ सच्चाई दिखाता है। जो इसमें देखता है, वह अपने अक्स के पीछे छुपी हर हकीकत को देखता है। अगर तुम्हारी मोहब्बत सच्ची है, तो यह शीशा तुम्हें कुर्बानी का रास्ता दिखाएगा। लेकिन यह इम्तिहान आसान नहीं होगा। सोच लो, क्या तुम तैयार हो?”

आशेर ने एक पल को ठहरी हुई हवेली की फिजा में खुद को ढूंढा। उसका दिल बेचैन था, लेकिन उसकी मोहब्बत ने उसकी बेचैनी पर काबू पा लिया।
“सुर्खाब, मेरी मोहब्बत पर शक मत करो। मैं इस इम्तिहान के लिए तैयार हूँ।”

कहानी जारी है, अगले सफ़े पे