जगजीत सिंह: जिसने ग़ज़ल को महफ़िलों की क़ैद से आज़ाद कर हर आम दिल तक पहुँचा दिया
बिना टिकट की ट्रेन, पिता की नाराज़गी, बेटे का ग़म और एक अधूरी महफ़िल। जगजीत सिंह की वह दास्तान पढ़िए, जिसने ग़ज़ल को हर दिल तक पहुँचाया।

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा
फिर आया 23 सितंबर 2011। उस शाम मुंबई के माटुंगा में शनमुखानंद हॉल की महफ़िल में ग़ुलाम अली और जगजीत सिंह एक साथ गाने वाले थे, और कुछ ही दिन पहले दिल्ली में यह जोड़ी समाँ बाँध चुकी थी। मगर सुबह घर पर आराम करते हुए जगजीत को बेचैनी महसूस हुई और क़रीब साढ़े नौ बजे उन्हें लीलावती अस्पताल ले जाया गया। दिमाग़ में ख़ून बहने (ब्रेन हैमरेज) की वजह से तीन घंटे का ऑपरेशन चला, और आयोजकों ने बताया कि उनकी जगह हरिहरन गाएँगे। सत्रह दिन की जद्दोजहद के बाद 10 अक्टूबर 2011 को उन्होंने आख़िरी साँस ली। अगले दिन चंदनवाड़ी श्मशान में उन्हें अंतिम विदाई दी गई। तब के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि जगजीत ने ग़ज़ल को हर किसी की पहुँच में ला दिया और लाखों संगीतप्रेमियों को ख़ुशी दी।
विरासत: वह महफ़िल जो कभी ख़त्म नहीं हुई
पंद्रह बरस बीत गए। 2012 में राजस्थान सरकार ने उन्हें मरणोपरांत राजस्थान रत्न से नवाज़ा। 2013 में उनके 72वें जन्मदिन पर गूगल ने डूडल बनाया, और 2014 में सरकार ने उनके सम्मान में दो डाक टिकट जारी किए। उनकी ज़िंदगी पर बनी डॉक्यूमेंट्री का नाम है काग़ज़ की कश्ती।
मगर असली विरासत इन सम्मानों में नहीं है। वह उस सादगी में है, जिसने ग़ज़ल को नवाबी महफ़िलों से निकालकर रेडियो की आवाज़, ट्रक की कैसेट और किसी के अकेलेपन तक पहुँचा दिया।
शनमुखानंद हॉल की वो शाम आज भी अधूरी है। मंच सजा, मगर जगजीत नहीं आए। फिर भी रात के दो बजे वही आवाज़ किसी के हेडफ़ोन में चल रही है, किसी ट्रक की कैसेट में, किसी की ठंडी होती चाय के पास। महफ़िलें मंचों की मोहताज नहीं होतीं, और जब तक कोई एक भी इंसान चुपके से उस आवाज़ में अपना दर्द ढूँढता है, यह महफ़िल जारी है।
और तुम, अगर तुम्हारी ज़िंदगी में भी कोई ऐसी शाम आई हो जब सब कुछ तैयार था और क़िस्मत ने आख़िरी लम्हे में परदा गिरा दिया, तो जगजीत को याद करना। जिसने बिना टिकट सफ़र किया, पिता की नाराज़गी सही, बेटे का ग़म उठाया, फिर भी सुरों का हाथ नहीं छोड़ा। तुम भी अपने दर्द को सुर दे दो, अपनी ज़िद को सादगी दे दो। हर अधूरी महफ़िल किसी न किसी दिल में एक दिन पूरी हो ही जाती है।
यौम-ए-वफ़ात पर एक चिठ्ठी
कहानी जारी है, अगले सफ़े पे