जगजीत सिंह: जिसने ग़ज़ल को महफ़िलों की क़ैद से आज़ाद कर हर आम दिल तक पहुँचा दिया
बिना टिकट की ट्रेन, पिता की नाराज़गी, बेटे का ग़म और एक अधूरी महफ़िल। जगजीत सिंह की वह दास्तान पढ़िए, जिसने ग़ज़ल को हर दिल तक पहुँचाया।

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा
मगर हर मिडिल क्लास बाप की तरह अमर सिंह के भी अपने सपने थे। वह चाहते थे कि बेटा पढ़-लिखकर बड़ा अफ़सर बने। जगजीत पहुँचे जालंधर के डी.ए.वी. कॉलेज, जहाँ के प्रिंसिपल हुनरमंद संगीतकारों की फ़ीस माफ़ कर देते थे। 1961 में आकाशवाणी के जालंधर केंद्र पर गाने-बजाने का काम भी शुरू हो गया। आगे चलकर उन्होंने कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से इतिहास में एम.ए. किया।
बिना बताए रवानगी और बंबई का बेरहम इम्तिहान
अगर बंबई ने पहली ही बार गले लगा लिया होता, तो शायद ग़ज़ल आज कुछ और होती।
1961 में वह पहली बार बंबई पहुँचे, फ़िल्मों में गाने का ख़्वाब लिए। फ़िल्मी दुनिया ने दरवाज़ा नहीं खोला और उदास जगजीत को जालंधर लौटना पड़ा। उनके अपने बयान के मुताबिक़, जो उनकी ज़िंदगी पर लिखी एक किताब में दर्ज है, उस वापसी में जेब में टिकट तक नहीं था और वह ट्रेन के ग़ुसलख़ाने में छिपकर सफ़र करते हुए लौटे।
फिर आया मार्च 1965। इस बार उन्होंने घरवालों को बताए बग़ैर बंबई की गाड़ी पकड़ ली। बाद में उन्होंने कहा था, “मुझे पता था कि मुझे गायक ही बनना है।”
बंबई ने इस बार भी फूल नहीं बिछाए। गुज़ारे के लिए इश्तिहारों के जिंगल गाए, छोटी-छोटी महफ़िलों और घरेलू कॉन्सर्टों में सुर लगाए। वह मोहम्मद रफ़ी के दीवाने थे और प्लेबैक सिंगर बनना चाहते थे, लेकिन उस दौर में ओ.पी. नैयर की जैज़ी बीट का सिक्का चल रहा था और मैदान में रफ़ी, किशोर कुमार और मन्ना डे जैसे दिग्गज खड़े थे। मदन मोहन जैसे संगीतकारों ने हौसला तो दिया, लेकिन काम की ख़बर नहीं आई। पार्टियों में गाने के बुलावे आते रहे, फ़िल्मों के नहीं।
एक तस्वीर, एक फ़ैसला और पिता की नाराज़गी
एक फ़ोटो-सेशन ने जगजीत की पहचान और उनके रिश्तों, दोनों को हिला दिया।
शुरुआती रिकॉर्ड के कवर के लिए जगजीत की तस्वीर खिंचनी थी। उन्होंने वह फ़ैसला किया, जिसके बारे में एक नामधारी सिख घर का बेटा सोचने से भी काँपता है। उन्होंने पगड़ी उतारी और केश कटवा लिए। उनकी नज़र में यह पहचान का सवाल था: जो तस्वीर एक बार छप गई, वही पूरे करियर का चेहरा बन जाएगी।
पंजाब में बैठे पिता को जब यह ख़बर मिली तो वह आग-बबूला हो गए। नामधारी परंपरा में केश कटवाना मना है, और रिपोर्ट्स के मुताबिक़ बाप-बेटे का रिश्ता लगभग टूटने की कगार पर पहुँच गया।
इसी दौर में, 1967 में, उनकी मुलाक़ात हुई बंगाली मूल की गायिका चित्रा दत्ता से। कहते हैं, शुरुआत में चित्रा को जगजीत का संगीत ख़ास पसंद भी नहीं आया था, मगर वक़्त ने वह करवा दिया जो पसंद-नापसंद नहीं कर पाती। दिसंबर 1969 में दोनों हमसफ़र बन गए।
कहानी जारी है, अगले सफ़े पे