मुश्ताक़ ख़ान: वो बल्लू जिसने एक सीन में पूरी फ़िल्म लूट ली
वेलकम के बल्लू मुश्ताक़ ख़ान अब नहीं रहे। बैहर से बंबई, ग़दर से अपहरण की उस सुबह तक, एक अनदेखे फ़नकार की पूरी दास्तान पढ़िए।

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा
जानिए कैसे एक आर्ट फ़िल्म से शुरू हुआ चार दशक लंबा सफ़र।
साल 1980। सईद अख़्तर मिर्ज़ा की फ़िल्म ‘अल्बर्ट पिंटो को ग़ुस्सा क्यों आता है’ रिलीज़ हुई। यह वो दौर था जब पैरेलल सिनेमा अपने उरूज पर था। इसी फ़िल्म में एक छोटे से रोल के साथ मुश्ताक़ ख़ान ने कैमरे का सामना किया।
रोल छोटा था, मगर दरवाज़ा खुल चुका था।
इसके बाद अस्सी का पूरा दशक एक लंबा इम्तिहान रहा। ‘थोड़ी सी बेवफ़ाई’ (1980), ‘कालिया’ (1981), ‘क़ब्ज़ा’ (1988)… फ़िल्में आती रहीं, किरदार छोटे-छोटे मिलते रहे। मगर मुश्ताक़ ख़ान ने कभी किसी रोल को छोटा नहीं समझा।
यही वो सबक़ है जो आज के दौर के हर स्ट्रगलर को सीखना चाहिए। मंच छोटा हो तो क्या, अदाकारी बड़ी होनी चाहिए।
नब्बे का दशक: चेहरा जो हर घर में पहचाना जाने लगा
एक बात कहूँ? नब्बे की शायद ही कोई बड़ी फ़िल्म हो, जिसके किसी न किसी फ़्रेम में मुश्ताक़ ख़ान न दिख जाएँ।
1990 में ‘आशिक़ी’ आई और देश में रोमांस की एक नई लहर दौड़ गई। उस फ़िल्म में भी मुश्ताक़ ख़ान थे। फिर ‘दिल है कि मानता नहीं’ (1991), ‘गुमराह’ (1993), ‘हम हैं राही प्यार के’ (1993), ‘जब प्यार किसी से होता है’ (1998)…
यह वो दौर था जब एक आम दर्शक उन्हें देखकर कहता, “अरे, यह तो वही हैं!” मगर नाम पूछो तो जवाब नहीं मिलता। यही एक कैरेक्टर एक्टर की सबसे बड़ी जीत भी है और सबसे बड़ा दर्द भी। चेहरा हर दिल में, नाम किसी की ज़ुबान पर नहीं।
अनुपम खेर ने उनके इंतिक़ाल पर इन्हीं फ़िल्मों को याद किया, ‘दिल है कि मानता नहीं’, ‘गुमराह’ और ‘जब प्यार किसी से होता है’ के सेट की यादें। जो लोग उनके साथ काम कर चुके थे, वो जानते थे कि यह आदमी कितना बड़ा फ़नकार है।
‘ग़दर’ का गुल ख़ान: जब कॉमेडियन ने दिखाया दूसरा रंग
जिसे लोग सिर्फ़ हँसाने वाला समझते थे, उसने एक देशभक्ति की महागाथा में अपनी अलग जगह बनाई।
साल 2001। सनी देओल और अमीषा पटेल की ‘ग़दर: एक प्रेम कथा’ बॉक्स ऑफ़िस पर तूफ़ान बनकर आई। इस फ़िल्म में मुश्ताक़ ख़ान ने गुल ख़ान का किरदार निभाया, और आज भी बहुत से लोग उन्हें इसी रोल से पहचानते हैं।
और फिर क़िस्मत का खेल देखिए। लगभग बाईस साल बाद जब ‘ग़दर 2’ आई, तो मुश्ताक़ ख़ान उसमें भी थे। दो दशकों का फ़ासला, मगर दर्शकों का वही प्यार।
बल्लू: वो एक सीन जिसने अमर कर दिया
जानिए कैसे दो मिनट के एक सीन ने एक फ़नकार को मीम्स और यादों में हमेशा के लिए ज़िंदा कर दिया।
साल 2007। अनीस बज़्मी की ‘वेलकम’। अक्षय कुमार, कैटरीना कैफ़, अनिल कपूर, नाना पाटेकर, परेश रावल… इतने बड़े सितारों की भीड़ में किसी साइड कैरेक्टर का याद रह जाना लगभग नामुमकिन है।
मगर फिर आता है बल्लू।
एक आदमी जो बड़ी संजीदगी से बताता है कि वो हॉकी का बहुत बड़ा खिलाड़ी था, और फिर वो लाइन… “मेरी एक टांग नकली है…”
कहानी जारी है, अगले सफ़े पे