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मुश्ताक़ ख़ान: वो बल्लू जिसने एक सीन में पूरी फ़िल्म लूट ली

वेलकम के बल्लू मुश्ताक़ ख़ान अब नहीं रहे। बैहर से बंबई, ग़दर से अपहरण की उस सुबह तक, एक अनदेखे फ़नकार की पूरी दास्तान पढ़िए।

मुस्कुराते हुए अभिनेता मुश्ताक़ ख़ान, वेलकम फ़िल्म के बल्लू

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा

शुरुआत में वो ख़ामोश रहे। मगर जब कॉमेडियन सुनील पाल के साथ भी ऐसा ही वाक़या हुआ, तो उनके इवेंट मैनेजर शिवम यादव ने 9 दिसंबर 2024 को बिजनौर में रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने गैंग के कई सदस्यों को गिरफ़्तार किया, और बाद में मास्टरमाइंड लवी पाल को भी एक मुठभेड़ के बाद पकड़ा गया। पुलिस के मुताबिक़ यह गैंग शक्ति कपूर को भी निशाना बनाने की योजना बना रहा था।

सोचिए ज़रा, जिस आदमी ने पूरी ज़िंदगी दूसरों को हँसाया, उसने अपनी ज़िंदगी का सबसे डरावना सीन अकेले जिया। और उससे भी ज़्यादा हिम्मत की बात, वो उसके बाद भी काम पर लौटे।

आख़िरी लड़ाई: जब ज़िंदगी ने आख़िरी सीन लिखा

कुछ जंगें आदमी हिम्मत से जीतता है, कुछ में सिर्फ़ हिम्मत बाक़ी रह जाती है।

मुश्ताक़ ख़ान लंबे वक़्त से कैंसर से जूझ रहे थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक़ तबीयत बिगड़ने पर उन्हें मुंबई के नानावटी अस्पताल में भर्ती कराया गया। 24 सितंबर 2026, गुरुवार की शाम क़रीब सात बजे, उन्होंने आख़िरी साँस ली। उनके बेटे मोहसिन ने समाचार एजेंसी पीटीआई को इसकी पुष्टि की।

ख़बर आई तो इंडस्ट्री सन्न रह गई। संजय मिश्रा, जिन्होंने ‘वेलकम’ में उनके साथ काम किया था, ने कहा कि उन्होंने सुना था तबीयत ख़राब रहती है, मगर यह नहीं सोचा था कि वो यूँ चले जाएँगे। उन्होंने एक दिल छू लेने वाली बात भी कही: उनकी ज़िंदगी में एक वक़्त ऐसा था जब मुश्ताक़ ख़ान उनके गार्जियन जैसे बन गए थे, और जब भी ज़रूरत पड़ती, वो उनसे सलाह लेते थे।

और फिर वो लाइन, जो इस पूरी दास्तान का निचोड़ है। संजय मिश्रा के अल्फ़ाज़ में: “वो एक बहुत अच्छे कलाकार थे, पर उनको इतना क्रेडिट नहीं मिला।”

राजपाल यादव ने बताया कि उन्हें यक़ीन नहीं हो रहा कि जिस शख़्स से उन्होंने दो घंटे पहले मिलकर हाथ मिलाया था, वो अब नहीं रहा। उन्होंने कहा कि मुश्ताक़ भाई एक लोकप्रिय इंसान और चहेते अभिनेता थे, हैं, और हमेशा रहेंगे।

विरासत: वो टांग नकली थी, फ़न असली था

याद है इस दास्तान की शुरुआत? एक बंद कमरा, एक अज़ान, और एक आदमी जो अंधेरे से भागकर रौशनी तक पहुँचा।

मुश्ताक़ ख़ान की पूरी ज़िंदगी कुछ ऐसी ही थी। चार दशकों तक वो सितारों की चमक के पीछे खड़े रहे, एक ऐसे कमरे में जहाँ रौशनी हमेशा किसी और पर पड़ती थी। मगर जब भी मौक़ा मिला, एक सीन, एक डायलॉग, एक एक्सप्रेशन, वो भागकर सीधे दर्शकों के दिल तक पहुँच गए।

बल्लू ने कहा था, उसकी एक टांग नकली है। हम हँसे। मगर आज समझ आता है कि उस हँसी के पीछे जो था, वो बिल्कुल असली था। बैहर से बंबई तक का असली संघर्ष, छोटे रोल्स का असली सब्र, और एक असली फ़नकार का असली हुनर।

कहानी जारी है, अगले सफ़े पे