होम / मशहूर हस्तियाँ / साहिर लुधियानवी: जिसने हर घर में मोहब्बत की रोशनी की और ख़ुद उम्र भर परछाइयाँ से घिरा रहा
मशहूर हस्तियाँ

साहिर लुधियानवी: जिसने हर घर में मोहब्बत की रोशनी की और ख़ुद उम्र भर परछाइयाँ से घिरा रहा

लफ़्ज़ों का जादूगर, जिसकी नज़्म गीत बनी। लुधियाना की हवेली से बंबई तक का सफ़र। वो साहिर लुधियानवी था।

साहिर लुधियानवी का चित्र, पीछे सुनहरा घेरा और शीर्षक लफ़्ज़ों के जादूगर

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा

1943 में वह लाहौर आ बसे और 1944 में प्रीत नगर के एक मुशायरे में उनकी मुलाक़ात अमृता प्रीतम से हुई। अमृता उस वक़्त तक शादीशुदा थीं, और इस रिश्ते का कोई नाम नहीं था। कहा जाता है कि दोनों घंटों साथ बैठे रहते थे, बिना बोले। साहिर सिगरेट पीते रहते थे और अमृता उन्हें देखती रहती थीं, और उनके जाने के बाद बुझी हुई सिगरेट के टुकड़े संभालकर रख लेती थीं। अमृता ने ख़ुद अपने इन्टरव्यू और किताबों में इस मोहब्बत का इक़रार किया है।

तल्ख़ियाँ उन्हीं दिनों की उपज है, जो लगभग 1945 में छपी और जिसने उन्हें उर्दू के नई पीढ़ी के शायरों में खड़ा कर दिया। अमृता के अलावा उनके कुछ और रिश्तों के किस्से भी सुने गए, जिनमें गायिका सुधा मल्होत्रा और अदीबा हज़रा मसरूर का नाम आता है। मगर वह किसी भी रिश्ते को निकाह तक नहीं पहुँचा सके।

बंबई और गीतों की जादूगरी

जो शायर तल्ख़ियाँ लिखता था, उसने सिनेमा को एक नया लहजा दे दिया।

बँटवारे के बाद वह थोड़े समय के लिए दिल्ली रहे और फिर मुंबई आ गए। कारवाँ का सबसे अहम पडाव रहा गुरु दत्त की प्यासा (1957), जिसमें उनके लिखे गीत एस.डी. बर्मन की धुनों पर सजे। दिलचस्प है कि यह जोड़ी सुन्दर तो थी, मगर मिज़ाज की वजह से प्यासा के बाद दोबारा कभी साथ काम नहीं कर सकी।

साठ के दशक की शुरूआत में ताजमहल (1963) के गीत आए, जिनमें जो वादा किया लता और मोहम्मद रफ़ी के साथ एक ख़ूबसूरत दोगाना है। इसी के लिए उन्हें 1964 में पहला फ़िलमफ़ेयर पुरस्कार मिला। फिर कभी कभी (1976) ने उन्हें दूसरा फ़िलमफ़ेयर दिलाया, और 1971 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से नवाज़ा।

आसान लफ़्ज़, गहरी सच्चाई

नज़्म की नाज़ुकी और आम आदमी की ज़बान, दोनों को एक साथ निभाना आसान नहीं।

साहिर ने हिंदुस्तानी के आसान लफ़्ज़ों का इस्तेमाल किया, फिर भी नज़्म की वह नाज़ुक रसमीयत बनाए रखी। वह उस प्रगतिशील लेखक आंदोलन का हिस्सा थे जिसमें कैफ़ी आज़मी जैसे दूसरे शायर भी थे। साहिर की शायरी में समाज की नाइंसाफ़ियों पर तीखा सवाल है, और इसी तीखेपन का सबूत उनका यह शेर है:

दुनिया ने तज़रुबात-ओ-हवादिस की शक्ल में
जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूँ मैं

यानी दुनिया ने जो तज़रुबे और हादसे दिए, वह सब वह लौटा रहा है, नज़्म और गीत की शक्ल में। एक ही शेर में उनकी पूरी शायरी का मिज़ाज समाया हुआ है।

परछाइयाँ

अपने ही बनाए घर में अकेला रह गया वो आदमी, जिसके लफ़्ज़ों ने हर घर में रोशनी की थी।

कहानी जारी है, अगले सफ़े पे