रकीबनामा: दो दुश्मनों की दास्तान
एक तूफ़ानी रात में दो कट्टर प्रतिद्वंद्वी बर्फ़ में फंस जाते हैं, और सामने आता है तीन साल पुराना एक ऐसा सच जिसने दोनों की ज़िंदगी बदल दी।

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा
“दानिश!” अलीज़ा चीख़ी, उसने बिना सोचे अपनी आइस-एक्स ज़मीन में गाड़ी, अपनी सेफ़्टी रस्सी का एक सिरा उसकी कमर के गिर्द बाँधा, और दूसरा सिरा दानिश की तरफ़ फेंका। “पकड़ो!” उसकी आवाज़ में इतनी सख़्ती थी कि दानिश ने बिना सवाल किए रस्सी थाम ली, एक हाथ से आर्यन को सँभालते हुए, दूसरे से रस्सी को।
अलीज़ा ने पूरी ताक़त से रस्सी खींची, अपने पैर बर्फ़ में गड़ाकर, दाँत भींचकर। कुछ ही सेकंड, मगर वो हर पल एक सदी जैसा लगा। आखिरकार दानिश और आर्यन, दोनों सुरक्षित कगार पर वापस आ गए। दानिश हाँफते हुए जमीन पर बैठ गया, “शुक्रिया,” उसने कहा, आवाज़ काँप रही थी।
“मुझसे शुक्रिया मत कहो,” अलीज़ा ने सख्ती से कहा, मगर इस बार उसकी आवाज़ में नफ़रत नहीं, सिर्फ़ थकान थी, “पहले उस बच्चे को अंदर ले चलो, बहस बाद में हो सकती है।”
चट्टानी ओट
किसी तरह तीनों उस चट्टानी ओट तक पहुँचे, ठीक पहाड़ के उसी मोड़ पर जहाँ तीन साल पहले अलीज़ा के अब्बू की तबीयत बिगड़ी थी। बाहर हवा और तेज़ हो गई थी। वायरलेस सेट पर सिर्फ़ खड़खड़ाहट थी, नेटवर्क का कोई नामोनिशान नहीं। रात भर के लिए, चाहे-अनचाहे, यही एक चट्टानी ओट उनकी पूरी दुनिया बन गई थी।
आर्यन को दोनों ने मिलकर सारे उपलब्ध जैकेट और स्लीपिंग बैग में लपेटा। तापमान गिरता जा रहा था, और आर्यन काँपने के साथ साथ बेहोशी की तरफ़ बढ़ने लगा था।
वो रात, वो सच
पहला घंटा दोनों ने ख़ामोशी में काटा, आर्यन को गरम रखने में मशग़ूल। मगर अचानक उसकी साँसें और धीमे पड़ने लगीं, होंठ नीले पड़ने लगे। “हाइपोथर्मिया है,” दानिश ने घबराकर कहा, “इसे हमारी शरीर की गर्मी चाहिए, अभी।”
बिना एक पल गंवाए, दोनों ने अपने जैकेट उतारे और आर्यन को बीच में लेकर, अपनी बॉडी हीट से उसे गरम करने की कोशिश शुरू की, हाथ मलते हुए, उसका नाम पुकारते हुए ताकि वो होश में रहे। कुछ मिनटों की जद्दोजहद के बाद, आर्यन ने आँखें खोलीं और धीरे से कराहा। दोनों ने राहत की साँस ली।
“शुक्रिया,” अलीज़ा ने कहा, मगर लफ़्ज़ उसके गले में अटक गया, जैसे बरसों बाद यह लफ़्ज़ उसकी ज़ुबान पर आया हो।
“मुझसे शुक्रिया मत कहो,” दानिश ने आँखें चुराते हुए कहा, “तुम्हें लगता है मैं आज भी वही इंसान हूँ जिसने तुम्हारे अब्बू को मरने दिया।”
अलीज़ा कुछ नहीं बोली। बाहर तूफ़ान की गरज सुनाई दे रही थी, और अंदर, तीन साल की ख़ामोशी आखिरकार टूटने को थी।
“उस रात मैं ग़लत रास्ते से नहीं उतरा था अलीज़ा,” दानिश ने आखिरकार कहा, आवाज़ काँप रही थी, “मैं सबसे तेज़ रास्ते से अकेला नीचे भागा था, मदद बुलाने। वायरलेस उसी तूफ़ान में ख़राब हो गया, जैसे आज हो सकता है। मैंने पूरे तीन घंटे भागकर बेस कैंप तक ख़बर पहुँचाई, मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।”
“तो तुमने यह बात कभी बताई क्यों नहीं?” अलीज़ा की आवाज़ में गुस्सा कम, हैरानी ज़्यादा थी।
कहानी जारी है, अगले सफ़े पे