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एक किस्त, एक दास्तान

रकीबनामा: दो दुश्मनों की दास्तान

एक तूफ़ानी रात में दो कट्टर प्रतिद्वंद्वी बर्फ़ में फंस जाते हैं, और सामने आता है तीन साल पुराना एक ऐसा सच जिसने दोनों की ज़िंदगी बदल दी।

अलीज़ा और दानिश बर्फ़ीले तूफ़ान में पीठ से पीठ सटाए खड़े, तूफ़ान में दो अजनबी कहानी

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा

“किस मुँह से बताता?” दानिश ने आसमान की तरफ़ देखते हुए कहा, “तुमने अपने अब्बू को खोया था, अलीज़ा। मेरी सफ़ाई से तुम्हारा दर्द कम नहीं होना था, बस मेरा बोझ हल्का होता। मैंने सोचा, तुम्हारी नफ़रत बर्दाश्त कर लूँगा।”

कभी कभी सबसे बड़ी मोहब्बत यही होती है, अपनी सफ़ाई को क़ुर्बान कर देना, ताकि सामने वाले का ज़ख़्म और गहरा न हो।

अलीज़ा की आँखों में आँसू आ गए, इस बार गुस्से के नहीं। तीन साल की नफ़रत, तीन साल का ग़ुस्सा, सब एक पल में उसे झूठा लगने लगा। “मुझे माफ़ कर दो दानिश,” उसने बमुश्किल कहा, “मैंने बिना पूछे तुम्हें मुजरिम बना दिया।”

“तुम्हें माफ़ी माँगने की ज़रूरत नहीं,” दानिश ने कहा, हल्की सी मुस्कुराहट के साथ, “तुमने अपना बाप खोया था। मैं भी उतना ही टूटा था, बस रोने का हक़ भी नहीं था मुझे।”

बर्फ़ीली दरार

सुबह के क़रीब तीन बजे तूफ़ान थोड़ा थमा, मगर वायरलेस अब भी ख़ामोश था। आर्यन की हालत स्थिर तो थी, मगर उसे जल्द से जल्द मेडिकल मदद चाहिए थी। दानिश को याद आया, यहाँ से थोड़ा ऊपर, एक पुरानी बर्फ़ीली दरार के पार, एक ऊँची चट्टान थी जहाँ कभी कभी मोबाइल नेटवर्क का एक बार सिग्नल पकड़ में आ जाता था।

“मैं जाता हूँ,” दानिश ने कहा, अपनी रस्सी और आइस-एक्स उठाते हुए। “अकेले? इस मौसम में?” अलीज़ा ने रोकने की कोशिश की। “आर्यन को अकेला नहीं छोड़ सकते, और दोनों नहीं जा सकते। मुझे जाने दो,” दानिश ने कहा, उसकी आँखों में एक अजीब सा इत्मीनान था।

अलीज़ा ने उसे सुरक्षा रस्सी से बाँधा, अपने हाथों से गाँठ को दो बार जाँचा। “जल्दी वापस आना,” उसने कहा, आवाज़ में एक नई फ़िक्र थी ।दानिश धीरे धीरे उस संकरी बर्फ़ीली दरार के किनारे-किनारे बढ़ा, हर क़दम फूँक फूँककर रखते हुए। एन बीचोंबीच, बर्फ़ की एक पतली परत उसके पैर के नीचे से टूट गई। उसका एक पैर हवा में लटक गया, दूसरा किसी तरह किनारे पर टिका रहा। रस्सी खिंची, अलीज़ा ने दूसरे सिरे पर पूरा वज़न डालकर उसे थामा, चीख़ते हुए, “दानिश, हिलना मत, मैं पकड़े हूँ!”

कुछ पलों की जद्दोजहद के बाद, दानिश ने ख़ुद को ऊपर खींच लिया, साँस फूली हुई, दिल तेज़ धड़क रहा था। उसने आगे बढ़कर चट्टान तक पहुँचकर अपना फ़ोन निकाला, और आखिरकार, एक बार एंटीना पर एक लाइन सिग्नल दिखा। उसने काँपते हाथों से बेस कैंप को कॉल लगाई। “यहाँ ट्रेकर घायल है, तीन लोग फंसे हैं, कोओर्डिनेट्स भेज रहा हूँ, जल्दी भेजो टीम!”

रेस्क्यू

कॉल कटने के कुछ ही देर बाद, दूर से हेलिकॉप्टर के पंखों की आवाज़ सुनाई देने लगी। सुबह की पहली किरणों के साथ, रेस्क्यू टीम की रस्सी सीढ़ी नीचे उतरी। आर्यन को पहले सुरक्षित निकाला गया, फिर अलीज़ा, फिर दानिश।

कहानी जारी है, अगले सफ़े पे