आख़िरी कॉल: एक अधूरी मोहब्बत का इंसाफ़
मौत के बाद भी अगर मोहब्बत कोई रास्ता ढूँढ ले, तो कैसा हो? रेहान और ज़ोया की एक ऐसी दास्तान, जिसमें एक आख़िरी कॉल ने पूरे राज़ को बेनक़ाब कर दिया। पढ़िए।

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा
बगल के कमरे में फ़वाद बैठा था, हाथ काँप रहे थे। उसे यक़ीन था कि अलिशबा अपने रसूख़ से, अपने वकीलों से, दोनों को इस मुसीबत से निकाल लेगी। उसने चुप रहने का फ़ैसला किया, ठीक वैसे ही जैसे उस रात हाईवे पर किया था। पर जब घंटों बाद उसे भी उसी कमरे में लाया गया, और उसने शीशे के पार अलिशबा को वकील से बात करते देखा, उसकी आँखों में एक अलग ही सुकून था, एक ऐसा सुकून जो सिर्फ़ तब आता है जब कोई अपनी जान बचाने का रास्ता ढूँढ चुका हो।
फ़वाद का शक सही निकला। जब इंस्पेक्टर सुनील ने अलिशबा के सामने फ़वाद की रिकॉर्ड की हुई धमकी भरी आवाज़ बजाई, अलिशबा ने एक पल भी नहीं गँवाया। “ये सब फ़वाद का किया-धरा है, इंस्पेक्टर। प्लान उसी का था, मैंने तो बस…” उसकी आवाज़ अटक गई, पर तीर छूट चुका था।
फ़वाद को जब ये बात पता चली, वो सन्न रह गया। जिस औरत के रसूख़ पर उसने अपनी पूरी ज़िंदगी दाँव पर लगा दी थी, उसी ने पलक झपकते उसे बलि का बकरा बना दिया था। “तुमने कहा था तुम मुझे बचा लोगी,” उसने चीख़कर कहा, हथकड़ियों में जकड़े हाथों से मेज़ पीटते हुए। अलिशबा ने उसकी तरफ़ देखा तक नहीं। दोनों ने एक-दूसरे को धोखा दिया था, और यही उनकी सबसे बड़ी, सबसे आख़िरी ग़लती साबित हुई।
दोनों गिरफ़्तार हुए, हथकड़ियों में बाहर निकाले गए, वही सड़क, वही दुनिया, जिसमें कभी उन्होंने एक बेगुनाह की ज़िंदगी छीनने की साज़िश रची थी। रेहान की मौत का राज़ आख़िरकार सुलझ गया, इतने महीनों बाद, इतनी ख़ामोश रातों बाद।
“जो साज़िश दो दिलों की दुश्मनी से बुनी जाती है, वो देर-सवेर उन्हीं दिलों की कमज़ोरी से उधड़ भी जाती है।”
एक अधूरी मोहब्बत का इंसाफ़
फ़ैसले वाले दिन, अदालत से निकलते हुए ज़ोया के क़दम भारी थे, पर दिल पर से एक बोझ हट चुका था। रात को घर पहुँचकर, उसने वही अलमारी फिर खोली, वो डायरी, वो रिकॉर्डर, अब बस निशानियाँ थीं, किसी लड़ाई की, जो आख़िरकार जीती जा चुकी थी। उसने डायरी को सीने से लगाया और धीरे से बुदबुदाई, “मिल गया रेहान, तुम्हें इंसाफ़ मिल गया।”
उस रात के बाद, ज़ोया को फिर कभी वो अनजान कॉल नहीं आई। न घंटी बजी, न सन्नाटा पसरा। शायद रेहान की रूह को अब चैन मिल गया था, क्योंकि जो इंसाफ़ वो ख़ुद अपनी ज़िंदगी में नहीं माँग सका, वो उसकी मोहब्बत ने उसे उसकी मौत के बाद दिला दिया था।
बरसों बाद भी, जब कभी ज़ोया की उँगलियाँ फ़ोन की स्क्रीन पर बेवजह ठहर जाती हैं, वो उस रात को याद करती है, जब एक कॉल ने, एक ऐसी कॉल ने जो कभी अदालत में सबूत नहीं बन सकती थी, उसे सच तक पहुँचा दिया था। “ताउम्र सिर्फ़ तुमसे मोहब्बत करूँगा,” रेहान ने कहा था, और शायद यही वो वादा था जिसने मौत की सरहदें भी पार कर लीं, बस एक बार, आख़िरी बार, अपनी बात कहने के लिए।
कहानी जारी है, अगले सफ़े पे