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आख़िरी कॉल: एक अधूरी मोहब्बत का इंसाफ़

मौत के बाद भी अगर मोहब्बत कोई रास्ता ढूँढ ले, तो कैसा हो? रेहान और ज़ोया की एक ऐसी दास्तान, जिसमें एक आख़िरी कॉल ने पूरे राज़ को बेनक़ाब कर दिया। पढ़िए।

ज़ोया अकेली अंधेरे कमरे में फ़ोन थामे, आख़िरी कॉल की दास्तान

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा

SUV का दरवाज़ा खुला। दो साये उभरे, धीरे-धीरे रेहान की तरफ़ बढ़ते हुए। अंधेरा इतना गहरा था कि चेहरे साफ़ नज़र नहीं आते थे, बस दो धुंधली आकृतियाँ, एक साया एक औरत का था, दूसरा एक मर्द का। रेहान ज़ख़्मी था, हिलने की कोशिश कर रहा था, पर आँखें धीरे-धीरे बंद होती जा रही थीं।

एक औरत की आवाज़ गूँजी, ठंडी, बिना किसी पछतावे के। “ये ज़रूरी था। तुमने हमें हमारे लिए कोई और रास्ता नहीं छोड़ा।”

दूसरी आवाज़ मर्द की थी, पर उसमें एक झिझक साफ़ महसूस होती थी, जैसे वो दिल से इस फ़ैसले के साथ न हो। कुछ पल की ख़ामोशी के बाद, दोनों साये उसे मरता हुआ छोड़कर अंधेरे में गुम हो गए, ये मानकर कि काम तमाम हो चुका है।

रेहान की साँसें अब गिनी-चुनी रह गई थीं। उस अंधेरे में, उस तकलीफ़ में, उसके ज़हन में सिर्फ़ एक ही नाम था।

“ज़ोया,” उसने बमुश्किल कहा, जैसे वो उसी वक़्त उसके सामने खड़ी हो। “मुझे माफ़ कर देना। मैं ज़िंदगी भर तुम्हारा साथ न निभा सका। पर एक बात ज़रूर है, आज मैं इस दुनिया से जा रहा हूँ, और फ़ख़्र से कह सकता हूँ कि मैं सिर्फ़, और सिर्फ़, तुम्हारा था।”

उसकी आँखें बंद हो गईं, पर उसके आख़िरी ख़याल में न कोई ग़ुस्सा था, न कोई बदला, सिर्फ़ एक अधूरा प्यार था, जो सुकून की ज़िन्दगी उसने सोची थी वह अधूरी रह गयी। शायद यही वो अधूरापन था, जो मौत के बाद भी कोई रास्ता ढूँढ लाया, ज़ोया तक, ताकि जो इंसाफ़ उसकी ज़िंदगी में नहीं मिल सका, वो उसकी मौत के बाद मिल सके।

“जो दिल आख़िरी साँस तक किसी का रहा, वो मिट्टी में मिलकर भी किसी का ही रहता है।”


सदमा और सवाल

अगली सुबह ज़ोया के फ़ोन पर पुलिस स्टेशन से कॉल आई। जो ख़बर उस फ़ोन ने दी, उसने ज़ोया की दुनिया को एक पल में ख़ाक कर दिया। उसका रेहान अब नहीं रहा।

ज़ोया को होश तक नहीं रहा। कुछ घंटों बाद, जब वो पुलिस स्टेशन पहुँची, इंस्पेक्टर सुनील ने उसे बताया कि जिस काम के लिए रेहान मुंबई गया था, बैंक के किसी भी रिकॉर्ड में ऐसी कोई फ़ाइल थी ही नहीं। “ये एक सोची-समझी साज़िश लगती है,” इंस्पेक्टर ने कहा, “पर बिना किसी सबूत के, बिना किसी मक़सद के, हम आगे कैसे बढ़ें?”

ज़ोया के पास कोई जवाब नहीं था। उसे नहीं मालूम था कि उसके शौहर का कोई दुश्मन भी हो सकता है। महीने गुज़रे, ज़ोया धीरे-धीरे सदमे के अंधेरे से उबरने की कोशिश करती रही। इसी बीच, एक अनजान नंबर से उसके फ़ोन पर कॉल्स आनी शुरू हुईं। कभी घंटी बजती, कभी बस सन्नाटा। जब वो उठाती, कोई बोलता नहीं, बस कुछ पल की गहरी ख़ामोशी के बाद फ़ोन कट जाता।


एक नया चेहरा

कहानी जारी है, अगले सफ़े पे