होम / एक किस्त, एक दास्तान / आख़िरी कॉल: एक अधूरी मोहब्बत का इंसाफ़
एक किस्त, एक दास्तान

आख़िरी कॉल: एक अधूरी मोहब्बत का इंसाफ़

मौत के बाद भी अगर मोहब्बत कोई रास्ता ढूँढ ले, तो कैसा हो? रेहान और ज़ोया की एक ऐसी दास्तान, जिसमें एक आख़िरी कॉल ने पूरे राज़ को बेनक़ाब कर दिया। पढ़िए।

ज़ोया अकेली अंधेरे कमरे में फ़ोन थामे, आख़िरी कॉल की दास्तान

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा

एक रात, बहुत देर हो चुकी थी। ज़ोया अपने कमरे में अकेली बैठी रेहान की तस्वीर निहार रही थी, तभी उसका फ़ोन बजा। अनजान नंबर। काँपते हाथों से उसने फ़ोन उठाया।

दूसरी तरफ़ से जो आवाज़ उभरी, वो रेहान की थी। ज़ोया का दिल एक पल के लिए धड़कना ही भूल गया। “रे… रेहान?” उसने बमुश्किल कहा, जैसे लफ़्ज़ ख़ुद उसके गले में अटक गए हों।

आवाज़ साफ़ नहीं थी, जैसे किसी बहुत दूर के जहान से आ रही हो, पर लफ़्ज़ फिर भी पहचाने जा सकते थे। “ज़ोया… जो तुम ढूँढ रही हो… वो मेरी अलमारी में है… नीचे वाले ख़ाने में…”

कॉल कट गई। ज़ोया उस रात भर सो न सकी। अगली सुबह उसने काँपते हाथों से रेहान की पुरानी अलमारी खोली। नीचे वाले ख़ाने में, एक छोटी सी डायरी और एक पुराना डिजिटल रिकॉर्डर रखा था।


डायरी का राज़

डायरी के पन्नों में रेहान की अपनी लिखावट थी, और उसमें दर्ज थी एक पूरी दास्तान, बरसों पुरानी, कॉलेज के दिनों की।

MBA फाइनांस के पहले ही साल में, साहिर और रेहान का सबसे क़रीबी दोस्त बन गया था, साहिर सीधा-सादा, मामूली घर से आने वाला। साहिर एक लड़की को दिल दे बैठा था, अलिशबा, ख़ूबसूरत मगर उतनी ही घमंडी, पैसे और रुतबे की भूखी। जिस दिन साहिर ने हिम्मत करके अपने जज़्बात बयान किए, अलिशबा ने सबके सामने, बेइज़्ज़त करते हुए उसे ठुकरा दिया था। रेहान साहिर के साथ खड़ा रहा, उसे संभाला, हौसला दिया, और यहीं से अलिशबा के दिल में रेहान के लिए एक अजीब सी खार पैदा हो गई थी, हालाँकि उसे ख़ुद अभी इसका एहसास नहीं था।

उसी बैच में एक और लड़का था, फ़वाद, एक औसत छात्र, जो रेहान की काबिलियत और उसकी लोकप्रियता से चुपचाप जलता था, हालाँकि पूरे कॉलेज के दौरान दोनों का आमना-सामना कभी नहीं हुआ। रेहान को तो फ़वाद का नाम तक याद नहीं था। लास्ट सेमेस्टर से पहले ही एक बड़े बैंक ने कैंपस प्लेसमेंट में रेहान को नौकरी दे दी, और यहीं से अलिशबा की नज़रें भी बदल गईं। उसने रेहान को प्रपोज़ किया, पर रेहान ने साफ़ मना कर दिया, “तुम्हें इंसान नहीं, उसके पास क्या है, वो पसंद है। और जिस तरह तुमने साहिर के साथ किया था, वो मैं कभी नहीं भूल सकता।” अलिशबा का घमंड उस दिन चूर-चूर हो गया, “एक दिन तुम्हें इसका पछतावा होगा,” उसने जाते-जाते कहा था, और किसी को नहीं पता था कि ये सिर्फ़ एक जुमला नहीं, बरसों बाद की एक चेतावनी थी।

कहानी जारी है, अगले सफ़े पे