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आख़िरी कॉल: एक अधूरी मोहब्बत का इंसाफ़

मौत के बाद भी अगर मोहब्बत कोई रास्ता ढूँढ ले, तो कैसा हो? रेहान और ज़ोया की एक ऐसी दास्तान, जिसमें एक आख़िरी कॉल ने पूरे राज़ को बेनक़ाब कर दिया। पढ़िए।

ज़ोया अकेली अंधेरे कमरे में फ़ोन थामे, आख़िरी कॉल की दास्तान

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा

कुछ हफ़्तों बाद, बैंक की तरफ़ से फ़वाद नाम का एक शख़्स ज़ोया के घर मिलने के लिए आया, उसने रेहान की जगह ब्रांच में ज्वाइन किया था, वह बोला की क्यूंकि रेहान उसी के बैच में था तो उसने सोचा ज़ोया का हाल ले लूँ। शांत लहजा, नरम मिज़ाज, बातचीत में सलीक़ा। ज़ोया को उसमें कुछ जाना-पहचाना सा एहसास हुआ, हालाँकि वो ख़ुद तय नहीं कर पाई कि आख़िर क्यों।

आने वाले कुछ हफ्तों मैं वह कई बार आया और उसने ज़ोया की नौकरी की तलाश में मदद की, और धीरे-धीरे दोनों के बीच एक अनकहा सा भरोसा बनने लगा।

एक रात, जब ज़ोया फ़ोन पर बात कर रही थी, अचानक डोरबेल बजी। दरवाज़ा खोला तो बाहर कोई नहीं था। उसी दौरान वो अनजान कॉल्स भी बढ़ने लगीं, साथ में एक अनदेखा सा ख़ौफ़ भी उसके घर की दीवारों में उतरने लगा।

अगले दिन ज़ोया थाने पहुँची, और शिकायत दर्ज कराने। इंस्पेक्टर सुनील ने उसकी बात ध्यान से सुनी, हर तारीख़, हर वक़्त नोट किया, फिर कहा, “हम इन नंबरों को ट्रेस करवाते हैं, ज़ोया जी, पर टेलीकॉम कंपनी से जवाब आने में एक-दो दिन लग जाते हैं। आप बस थोड़ा सब्र रखें।”

वो दो दिन ज़ोया के लिए किसी सदी से कम नहीं थे। हर घंटी पर उसका दिल उछल पड़ता, हर नोटिफ़िकेशन पर वो उम्मीद से फ़ोन उठाती, ये सोचकर कि शायद इंस्पेक्टर सुनील का कॉल हो। रात को नींद उचटी-उचटी रहती, और दिन में वो बस खिड़की से बाहर देखती रहती, जैसे जवाब कहीं हवा में तैर रहा हो।

आख़िर तीसरे दिन इंस्पेक्टर सुनील का फ़ोन आया। ज़ोया ने साँस रोककर सुना, पर जो जवाब मिला, उसने उम्मीद की आख़िरी लकीर भी धुँधली कर दी। “न कोई फ़ाइल का सुराग़ मिला, न ही ये कॉल्स ट्रेस हो पाईं, ज़ोया जी। टेलीकॉम कंपनी के अनुसार यह नंबर मजूद ही नहीं हैं , लेकिन जब मैंने आपके फ़ोन की कॉल हिस्ट्री का स्क्रीनशॉट दिखयाया तो कंपनी वाले सकते मे आ गए, और उन्होंने फिर दुबारा चेक किया, पर अफ़सोस कुछ पता नहीं चला। मैं खुद हैरान हूँ, की इसको किस तरह सुलझाऊँ ! मुझे लगता है की जैसे कोई सोच-समझकर हर निशान मिटा रहा हो।”

“तो क्या मैं यूँ ही डरती रहूँगी, बिना ये जाने कि कौन है ये?” उसने पूछा, आवाज़ में थकान और ग़ुस्सा दोनों घुले हुए थे। इंस्पेक्टर सुनील के पास इस बार भी कोई तसल्ली-बख़्श जवाब नहीं था, सिर्फ़ एक वादा था, “हम नज़र रखे हुए हैं,” जो अब ज़ोया के कानों में खोखला सा लगने लगा था।

फ़ोन रखने के बाद वो देर तक सोचती रही, आख़िर कौन है जो उसे यूँ अंधेरे में रखकर, दूर से देख रहा है? हर अनजान नंबर, हर बजती घंटी, अब उसे रेहान की याद से ज़्यादा एक अनदेखे ख़तरे का एहसास दिलाने लगी थी। रातों को वो अक्सर अपने फ़ोन को घूरती रहती, जैसे उसकी स्क्रीन में ही कहीं वो जवाब छुपा हो, जो पुलिस भी नहीं ढूँढ पाई।


वो आख़िरी कॉल

कहानी जारी है, अगले सफ़े पे