तेरी उल्फत में | इज़हार-ए-मोहब्बत | क़िस्त 05
मेजर शेखर और मिस्टर शर्मा एक साथ खाने का लुत्फ उठा रहे थे। तभी मिस्टर शमशेर उनके पास पहुंचे और बोले “शेखर साहब, आपको बेटी की शादी की दिल से मुबारकबाद।” मेजर शेखर बोले “खान साहब सब ऊपर वाले का करम है, मुझे बेटी नहीं दी पर बेटी को रुखसत करने का सवाब दे दिया। […]

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा
मेजर शेखर और मिस्टर शर्मा एक साथ खाने का लुत्फ उठा रहे थे। तभी मिस्टर शमशेर उनके पास पहुंचे और बोले “शेखर साहब, आपको बेटी की शादी की दिल से मुबारकबाद।”
मेजर शेखर बोले “खान साहब सब ऊपर वाले का करम है, मुझे बेटी नहीं दी पर बेटी को रुखसत करने का सवाब दे दिया। साथ में मुझे लगता है कि एक बेटी परमानेंट आने भी वाली है!”
“वाह मिया क्या बात है” दोनों हाथ में लड्डू। राज के लिए लड़की देख ली क्या?” अब की बार मिस्टर शर्मा बोले।
“वाह भाई हमको भी तो बताओ कि किसको चुना है आपने राज के लिए।” गरम जोशी से शमशेर खान बोले।
“खान साहब, आप तो जानते ही हैं, बच्ची को, सिमरन! बड़ी ही प्यारी बच्ची है। जी थोड़ी देर में दिल जीत लिया। लगा ही नहीं कि अपनी बेटी नहीं है।”
“वाह क्या बात है, सिमरन बहुत ही प्यारी बच्ची है। सच्ची और जिंदादिल, कोई दिखावा नहीं है। दोनो की जोड़ी बहुत ही अच्छी है। अब तो बस अब इंतजार ना करिए। “शमशेर साहब ने भी अपनी रजामंदी दे डाली।
“हां, सही कहा आपने, राज का फाइनल ईयर है, इसके बाद थोड़ा बहुत सेटल हो जाए, बस मैं दोनों की शादी कर दूंगा।” मेजर शेखर बोले
“थोड़ा सेटल तो वह है ही, इंशा अल्लाह जिस तरह ये बच्चे काम कर रहे हैं, मैं तो इन्हें फुल-टाइम जॉब देने की सोच रहा हूं। बस यह बात अभी ज़ाहिर नहीं करिएगा!” शमशेर खान बोले
इस बात पे मिस्टर शर्मा और मेजर शेखर की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
"यारों की टोली और बातों का सिलसिला,
प्यार के सफर में दोस्ती का हौसला।
हंसते-हंसते हर मुश्किल को आसान बना दिया,
ऐसे रिश्तों ने जिंदगी को गुलजार बना दिया।"
“कशिश कहीं नहीं दिख रही शमशेर साहब। वह नहीं आई।” मिस्टर शर्मा बोले।
“नहीं जनाब, लड़की ने मुझे परेशान कर दिया है। ज़िद्दी हो गई है। समझ नहीं आता क्या होगा आगे? कोई ज़िम्मेदारी नहीं उठा सकती है। इसकी आदत कौन सुधारेगा? गलती मेरी है, मैंने ही ज़्यादा लाड प्यार से पाला जो है।” जवाब देते हुए शमशेर खान ने बताया।
अरे साहब अभी उम्र ही क्या है उसकी, बच्ची है! जब जिम्मेदारी मिलेगी तो निभा भी लेगी। मेजर शेखर ने तरफदारी वाले लहजे में कहा।
मिस्टर शर्मा कुछ सोचते हुए बोले “एक राय दूं मैं, खान साहब?” शमशेर खान बोले जी “शर्मा साहब पूछने वाली क्या बात है?” मिस्टर शर्मा फिर बोले “कशिश को ऑफिस ज्वाइन करवा दीजिए, काम तो उसे सीखना ही है, ऑफिस जाने से जिम्मेदारी का भी एहसास हो जाएगा। इससे आपका भी बोझ कुछ कम हो जाएगा।”
“यह राय तो कमाल की है, वैसे मुझे लगता नहीं उसमे कुछ बदलाव आएगा, पर कोशिश करने में क्या हर्ज है। रही बात मेरे बोझ की, वह बढ़ जाएगा उसके आने से।” शमशेर खान के यह कहने पर सब खिलखिला के हंस पड़े।
कहानी जारी है, अगले सफ़े पे