सफ़र-ए-इश्क़: एक अधूरे ख़त की दास्तान
एक पुरानी बोगी के आख़िरी सफ़र में, दो अजनबियों को मिलता है तीस साल पुराना एक अधूरा ख़त, और उसी के साथ शुरू होती है एक नई मोहब्बत की कहानी। पढ़िए।

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा
अलीना ने ख़त धीरे-धीरे पढ़ना शुरू किया, हर लफ़्ज़ को उसकी पूरी नज़ाकत के साथ अदा करते हुए। ये ख़त किसी “सकीना” के नाम था, किसी “मुराद” की तरफ़ से, तीस बरस पुराना। मुराद ने लिखा था कि वो हर हफ़्ते इसी ट्रेन से, इसी बोगी से गुज़रता था, सिर्फ़ इसलिए कि सकीना भी उसी वक़्त उसी सफ़र पर होती थी। महीनों तक वो उसे दूर से देखता रहा, कभी एक लफ़्ज़ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। आख़िर एक दिन उसने ये ख़त लिखा, दिल की हर बात उसमें उड़ेल दी, ये सोचकर कि अगली बार जब सकीना उसी सीट पर बैठेगी, वो चुपचाप उसे थमा देगा।
मगर वो अगली बार कभी नहीं आई। शायद सकीना ने वो रूट लेना छोड़ दिया, शायद ज़िंदगी उसे कहीं और ले गई। मुराद ने वो ख़त, अपनी उम्मीद समेत, उसी आर्मरेस्ट की दराज़ में छुपा दिया, ये सोचकर कि किसी दिन हिम्मत जुटाकर उसे निकालेगा और सकीना को ढूंड कर उसको दे देगा। मगर वो दिन कभी नहीं आया।
ख़त के आख़िर में सिर्फ़ एक नाम लिखा था, “मुराद,” और साथ में वही टिकट का पुराना टुकड़ा, जिस पर एक धुंधली तारीख़ थी, तीस बरस पुरानी।
अलीना ने ख़त नीचे रखा, कुछ देर ख़ामोश रही। “तीस साल,” आख़िरकार उसने कहा, “और ये अल्फ़ाज़ आज तक किसी ने नहीं पढ़े। सोचो, सकीना को कभी पता ही नहीं चला कि कोई उससे इतनी ख़ामोशी से मोहब्बत करता रहा।”
रेहान खिड़की के बाहर बारिश को देखता रहा। “शायद कुछ बातें इसलिए अधूरी रह जाती हैं,” उसने धीरे से कहा, “क्योंकि कहने की हिम्मत सही वक़्त पर नहीं आती।” अलीना ने उसकी तरफ़ देखा, और एक पल के लिए दोनों के बीच कुछ अनकहा सा तैर गया।
पुराना टीटी
रात के क़रीब दो बजे, कूपे का दरवाज़ा धीरे से खटका। एक बुज़ुर्ग टीटी अंदर झाँका, सफ़ेद बाल, झुकी हुई कमर, और वर्दी पर बरसों पुराना एक बैज। “टिकट चेक करने आया था,” उसने कहा, फिर उसकी नज़र मेज़ पर रखे ख़त और टिकट के टुकड़े पर पड़ी। उसका चेहरा एक पल में बदल गया, जैसे किसी बहुत पुरानी याद ने अचानक दस्तक दी हो।
“ये… ये आपको कहाँ मिला?” उसकी आवाज़ काँप रही थी।
रेहान ने आर्मरेस्ट के पैनल की तरफ़ इशारा किया, और कहा “शायद आज आर्मरेस्ट का यह पैनल भी अपने आखरी सफर को देखते हुवे रिटायर हो गया, इसके जंग लगे स्क्रू ढीले हुवे और एक झटके से खुल गए ।”
टीटी अंदर आया, कूपे के दरवाज़े पर टिककर बैठ गया, जैसे उसकी टाँगों ने अचानक साथ देना छोड़ दिया हो। “मेरा नाम फ़रहान है,” उसने कहा, “और मुराद… मुराद मेरे वालिद थे।”
कहानी जारी है, अगले सफ़े पे