सफ़र-ए-इश्क़: एक अधूरे ख़त की दास्तान
एक पुरानी बोगी के आख़िरी सफ़र में, दो अजनबियों को मिलता है तीस साल पुराना एक अधूरा ख़त, और उसी के साथ शुरू होती है एक नई मोहब्बत की कहानी। पढ़िए।

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा
कूपे में सन्नाटा छा गया। फ़रहान ने आगे बताया, बरसों पहले, जब वो ख़ुद नया-नया रेलवे में भर्ती हुआ था, इसी बोगी की मरम्मत के दौरान उसे ये ख़त मिला था। उसने पढ़ा, अपने वालिद की लिखावट पहचानी, और समझ गया कि ये किसी ऐसे राज़ की बात है जो उसके वालिद ने कभी घर में किसी को नहीं बताई। “मैंने कुछ सोच कर इसे वापिस रख दिया,” उसने कहा, “क्योंकि मुझे लगा, अब्बू ने ख़ुद इसे यहीं छुपाया था, शायद जान-बूझकर, ये सोचकर कि एक दिन कोई सही शख़्स इसे ढूँढ निकालेगा, शायद वह अपनी यह कहानी किसी अजनबी को सुनना चाहते थे। मुझसे उनका ये आख़िरी अधूरा ख़्वाब छीनने की हिम्मत नहीं हुई।”
अलीना ने पूछा, “क्या कभी सकीना का पता चला?”
फ़रहान ने सिर हिलाया, आधा हाँ, आधा ना। “अब्बू ने मरते वक़्त सिर्फ़ एक बार उनका नाम लिया था। मैंने बरसों काफी तलाश भी की, मगर कुछ हाथ नहीं लगा। शायद इसीलिए, जब भी मुझे इस रूट की ड्यूटी मिलती, मैं इस बोगी में एक बार ज़रूर आता, बस इस उम्मीद में कि शायद कभी कोई इस दराज़ तक पहुँचे, और वो कहानी आगे बढ़े जहाँ अब्बू छोड़ गए थे।”
उसने एक गहरी साँस ली। “आज इस बोगी का आख़िरी सफ़र है। मुझे नहीं पता था कि आज ही, आख़िरी रात, ये दराज़ खुलेगी। शायद अब्बू यही चाहते थे, कि उनकी कहानी कोई और भी महसूस करे।” उसने रेहान और अलीना, दोनों की तरफ़ देखा, जैसे कुछ समझ गया हो जो उन दोनों को अभी ख़ुद समझ नहीं आया था।
“कुछ कहानियाँ पूरी करने के लिए नहीं होतीं, बस आगे बढ़ाने के लिए होती हैं, एक दिल से दूसरे दिल तक।”
रात जो बातों में गुज़री
फ़रहान अपनी ड्यूटी पर लौट गया, मगर उसके जाने के बाद कूपे में जो ख़ामोशी बची, वो पहले वाली नहीं थी। रेहान और अलीना, दोनों देर तक चुप बैठे रहे, जैसे अभी-अभी सुनी कहानी को हज़म कर रहे हों।
“अजीब है ना,” अलीना ने आख़िर चुप्पी तोड़ी, “एक आदमी अपनी पूरी ज़िंदगी एक अधूरी मोहब्बत के साये में गुज़ार देता है, और उसका बेटा उस साये को ख़त्म होने से बचाने के लिए बरसों तक एक दराज़ की रखवाली करता रहता है।”
रेहान ने सिर हिलाया। “शायद इसलिए, क्योंकि कुछ मोहब्बतें कभी ख़त्म नहीं होतीं, बस अगली नस्ल तक पहुँच जाती हैं, किसी और शक्ल में।”
दोनों देर तक बातें करते रहे, अब वो शुरुआती नोक-झोंक बहुत पीछे छूट चुकी थी। अलीना ने बताया कि उसने उर्दू ऑनर्स सिर्फ़ इसलिए चुना था क्योंकि उसकी नानी उसे बचपन में उर्दू में लोरियाँ सुनाया करती थीं, और वो आवाज़ें आज भी उसके कानों में बसी हैं। रेहान ने बताया कि इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ते हुए उसे हमेशा ऐसा लगता था जैसे वो अपनी ही जड़ों से थोड़ा कटा हुआ है, और आज पहली बार उसे लगा कि शायद इस कमी को भरने में देर नहीं हुई।
बातों-बातों में अलीना ने एक शेर भी सुनाया, धीमी आवाज़ में, जैसे ख़ुद से कह रही हो:
कहानी जारी है, अगले सफ़े पे