सफ़र-ए-इश्क़: एक अधूरे ख़त की दास्तान
एक पुरानी बोगी के आख़िरी सफ़र में, दो अजनबियों को मिलता है तीस साल पुराना एक अधूरा ख़त, और उसी के साथ शुरू होती है एक नई मोहब्बत की कहानी। पढ़िए।

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा
“जो दिल में दबी रह गई, वो बात भी एक दिन ज़बान ढूँढ ही लेती है, बस थोड़ा वक़्त लगता है।”
रेहान मुस्कुराया। “ये मुराद साहब के लिए कहा, या मेरे लिए?” अलीना ने जवाब नहीं दिया, बस मुस्कुरा दी, और खिड़की के बाहर देखने लगी, जहाँ बारिश अब थम चुकी थी और आसमान में हल्की सी सुबह की झलक उतरने लगी थी।
सुबह की पहली झलक
सुबह की पहली रोशनी खिड़की से अंदर आई, नरम और सुनहरी। ट्रेन धीरे-धीरे रफ़्तार कम करने लगी, मंज़िल क़रीब थी। अलीना ने ख़त को धीरे से तह किया, जैसे किसी नाज़ुक चीज़ को सँभाल रही हो। “क्या लगता है, इसका क्या करना चाहिए?”
रेहान ने कुछ सोचा, फिर कहा, “फ़रहान साहब को दे देते हैं, हमेशा के लिए। ये कहानी उनकी है, हमारी सिर्फ़ इतनी भूमिका थी कि हम इसे बरसों की ख़ामोशी से बाहर ले आए।” अलीना ने सहमति में सिर हिलाया।
ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर रुकने ही वाली थी कि फ़रहान फिर एक बार कूपे में आया, इस बार बिना किसी औपचारिकता के। रेहान ने ख़त और टिकट का टुकड़ा उसकी तरफ़ बढ़ाया। “ये आपकी अमानत है,” उसने कहा।
फ़रहान की आँखें भर आईं। उसने ख़त को सीने से लगाया, कुछ पल के लिए कुछ नहीं बोल पाया। फिर धीरे से कहा, “शुक्रिया, कि आपने इसे सिर्फ़ काग़ज़ का टुकड़ा नहीं समझा।” उसने जाते-जाते एक बात और जोड़ी, “अब्बू अक्सर कहते थे, इश्क़ कभी बर्बाद नहीं जाता, बस रास्ता बदल लेता है। आज समझ आया, वो किस रास्ते की बात करते थे।” वो मुस्कुराकर चला गया, ख़त को अपने सीने से लगाए हुए, जैसे बरसों का बोझ आख़िरकार हल्का हो गया हो।
अलीना ने रेहान की तरफ़ देखा। “और हमारी कहानी का क्या?”
रेहान मुस्कुराया, पहली बार उस सफ़र में पूरे दिल से। “शायद अभी इतना ही काफ़ी है कि हम दोनों जानते हैं, की हमरी कहानी अभी बाकी है। बाक़ी, आने वाला नसीब का पन्ना धीरे-धीरे खुलेगा, जैसे वो पैनल खुला था, अपने वक़्त पर।” उसने अपना फ़ोन निकाला। “फ़िलहाल, इतना काफ़ी है कि हम शुरुवात के लिए नंबर एक्सचेंज कर ही सकते हैं, ताकि पता चलता रहे कि फ़रहान साहब ने सकीना को ढूँढा या नहीं।”
अलीना हँस पड़ी, वही मुस्कान जो अब रेहान को शुरुआत की तल्ख़ी से कहीं ज़्यादा अपनी लगने लगी थी। “मंज़ूर है। मगर एक शर्त पर, अगली बार जब भी सफ़र करेंगे, अपने सामान की जगह पहले से बुक कर लेना।”
प्लेटफ़ॉर्म के बाहर
ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर रुक गई। बोगी अपने आख़िरी सफ़र के आख़िरी पड़ाव पर पहुँच चुकी थी, कल से वो वर्कशॉप में होगी, अपना पुराना रूप खोते हुए। मगर उसके अंदर, उस आख़िरी रात में, एक कहानी ने अपना घर बदला था, एक बाप से बेटे तक, और अब दो अजनबियों के दिलों तक भी पहुँच चुकी थी, जो अब अजनबी नहीं रहे थे।
कहानी जारी है, अगले सफ़े पे