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सफ़र-ए-इश्क़: एक अधूरे ख़त की दास्तान

एक पुरानी बोगी के आख़िरी सफ़र में, दो अजनबियों को मिलता है तीस साल पुराना एक अधूरा ख़त, और उसी के साथ शुरू होती है एक नई मोहब्बत की कहानी। पढ़िए।

रेहान और अलीना पुरानी ट्रेन बोगी में तीस साल पुराना ख़त पढ़ते हुए, सफ़र-ए-इश्क़ की दास्तान

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा

बारिश तेज़ हो चली थी। ट्रेन एक सुनसान स्टेशन से पहले रुक गई, सिग्नल का इंतज़ार करते हुए, और अंधेरे में सिर्फ़ बारिश की बूँदों की टप-टप सुनाई देती रही। तभी पटरी पर एक हल्का झटका लगा, बोगी काँपी, और रेहान की सीट के आर्मरेस्ट का एक पुराना, बरसों से बंद पैनल अचानक हल्के से खुल गया।

रेहान ने झुककर देखा। अंदर एक पुराना, मुड़ा-तुड़ा लिफ़ाफ़ा पड़ा था, और साथ ही काग़ज़ का एक धुंधला टुकड़ा, शायद किसी पुरानी रेलवे टिकट का हिस्सा, जिस पर एक नाम आधा-अधूरा सा उभरा हुआ था। “ये क्या है भला,” उसने कहा, ज़्यादा ख़ुद से, अलीना से कम।

अलीना की नज़र फ़ोन से हटी। एक पल की झिझक के बाद, अपना ग़ुस्सा भूलकर, वो भी हल्के से झुक आई। “खोलो तो सही,” उसने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में पहले वाली तल्ख़ी नहीं थी, बस उत्सुकता थी।

रेहान ने काँपते हाथों से लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक ख़त था, उर्दू में लिखा हुआ, हर लफ़्ज़ किसी हुनरमंद हाथ की गवाही देता हुआ, मगर बेहद मुश्किल अल्फ़ाज़ में। उसने पढ़ना शुरू किया, और दूसरी ही लाइन पर अटक गया।


जो अपनी ही ज़बान से अनजान था

“इस लफ़्ज़ का मतलब क्या है…” रेहान बुदबुदाया, फ़ोन निकालकर गूगल पर टाइप करने लगा। जवाब मिला, उसने आगे पढ़ा, फिर एक और लफ़्ज़ पर अटका, फिर वही सिलसिला, टाइप करना, इंतज़ार करना, फिर पढ़ना। ये कोई तीन-चार बार दोहराया।

अलीना के होंठों पर एक मुस्कान तैर आई, जिसे उसने छुपाने की कोई ख़ास कोशिश नहीं की। “कैसे इंसान हैं आप,” उसने धीरे से कहा, “अपनी ही ज़बान समझने के लिए गूगल का सहारा लेते हैं, और बात-बात पर बड़े पढ़े-लिखे बनते हैं।”

रेहान ने सिर उठाया, हल्की सी शर्मिंदगी और उतनी ही चिढ़ एक साथ उसके चेहरे पर आई। “मैं इंग्लिश मीडियम से पढ़ा हूँ, इसमें शर्म की कौन सी बात है। और अगर आपको उर्दू इतनी आती है, तो ख़ुद क्यों नहीं पढ़ रहीं, मुझे तंग करने के बजाय?”

अलीना ने ख़त उसके हाथ से धीरे से ले लिया, एक पल रुककर मुस्कुराई, फिर बोली, “क्योंकि मैंने उर्दू में ऑनर्स किया है।” उसकी आवाज़ में एक शरारत भरा गुमान था, जैसे किसी पुराने हिसाब का बदला अभी-अभी चुकता हुआ हो।

रेहान की आँखें फैल गईं। “क्या! और अब तक ये बात छुपाए बैठी थीं?”

“आपने पूछा कब?” अलीना हँसी, और उस रात पहली बार, दोनों के बीच की तल्ख़ी थोड़ी पिघली। “ठीक है, माफ़ी माँगता हूँ, सामान वाली बात के लिए भी,” रेहान ने कहा।

“अरे, आपने माफ़ी माँगी! कमाल है!” अलीना हँसी। रेहान फिर हँस पड़ा, बेमन से सही, मगर हँसा ज़रूर। “अब चुपचाप सुनिए,” अलीना ने कहा, “मैं पढ़ती हूँ।”

“कभी-कभी दो अजनबियों के बीच की दीवार, किसी तीसरे के अधूरे लफ़्ज़ों से ही टूटती है।”


एक अधूरी मोहब्बत का क़िस्सा

कहानी जारी है, अगले सफ़े पे