तेरी उल्फत में | मोहब्बत, गलतफहमियां, और रिश्तों की उलझनें | क़िस्त 09
“अरे भाई, इंसान अपनी सोच से बड़ा छोटा होता है। और तुम्हारी सोच तो आला है।” शमशेर ख़ान ने अरसलान को समझाया। अरसलान उनकी बात पर सिर्फ मुस्कुराया। “हां तो भाई क्या लोगे चाय या कॉफी?” शमशेर ख़ान ने अरसलान से पूछा। “कॉफी सही रहेगी।” अरसलान ने कहा। “हम्म, ठीक है और क्या लोगे साथ […]

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा
“अरे भाई, इंसान अपनी सोच से बड़ा छोटा होता है। और तुम्हारी सोच तो आला है।” शमशेर ख़ान ने अरसलान को समझाया। अरसलान उनकी बात पर सिर्फ मुस्कुराया।
“हां तो भाई क्या लोगे चाय या कॉफी?” शमशेर ख़ान ने अरसलान से पूछा।
“कॉफी सही रहेगी।” अरसलान ने कहा।
“हम्म, ठीक है और क्या लोगे साथ में।” शमशेर ख़ान ने पूछा।
“बस कॉफी सर।” अरसलान ने मुस्कुराते हुए कहा।
“भाई तक्लुफ़ ना करो। तुम तो ज्यादातर हॉस्टल में खाते हो। कभी-कभी मेजर साहब के यहां घर का बना खाते हो। अरे भाई आज तो कुछ घर का खा लो।” यह कहकर शमशेर ख़ान ने अपने नौकर को बुलाया। नौकर के आने पर उससे बोले “शरफू बेटा, जरा बढ़िया सी कॉफी बना लाओ और साथ में गरम – गरम कवाब और फुलकियां।” शरफू रजामंदी से सर हिला के अंदर चला गया।
“हां तो अरसलान, कुछ बताओ अपने बारे में। तुमसे कभी ये सब बातचीत नहीं हुई।” शमशेर ख़ान ने अरसलान से पूछा।
“बस सर, मौका ही कब मिला। मैं लखनऊ से ताल्लुक रखता हूं। हमारा ख़ानदान लखनऊ का है।”
“वाह लखनऊ तो बड़ी उम्दा जगह है।” शमशेर ख़ान ने कहा।
“जी अच्छी जगह है, आज भी असल लखनऊ में आपको अदब और एहतराम मिलेगा।” अरसलान ने कहा।
“फिर यहाँ मुंबई कैसे आना हुआ। सिर्फ स्टडीज ही वजह तो नहीं होगी, लखनऊ तो खुद एक बड़ा शहर है एजुकेशन के लिहाज से।” शमशेर ख़ान ने पूछा।
“जी, असल में मेरे पैरेंट्स की डेथ हो गई थी एक्सीडेंट में। जब मैं बहुत छोटा था। दादाजान और दादीजान ने परवरिश करी। फिर दादीजान का इंतकाल हो गया। फिर दादाजान ने अपने आखिरी वक्त में मुझसे कहा उनके मरने के बाद लखनऊ छोड़ देना। क्योंकी मेरे रिश्तेंदारों को डर था कि कहीं दादाजान सब मेरे ही नाम ना कर डालें। उन्होंने महसूस कर लिया था कि उनके बाद मुझे कोई वहां सुकून नहीं लेने देता। बस मैं उनके इंतेकाल के बाद यहां आ गया।
“अरसलान यह बताकर चुप हो गया। उसकी आंखें नम हो गई थी। शमशेर ख़ान से अरसलान के आंसू छुपे नहीं। वह बोले “ओह, मुझे अफसोस है। और देखो मैंने भी तुम्हारे माज़ी का पूछकर तुमको रूला दिया।”
“अरे नहीं, बस दादाजान और दादीजान याद आ गए थे।” अरसलान ने ज़बरदस्ती मुस्कुराते हुए कहा।
“वैसे कभी अपने आपको अकेला मत समझना। यहां तुम्हारे इतने अच्छे दोस्त हैं। मेजर शेखर है। तुम्हारी रूबी आपा हैं। और हम भी तो हैं। क्या हुआ कि तुम्हारे सगों ने तुमसे नाता न रखा। किसी भी रिश्ते में खून से ज़्यादा मोहब्बत मायने रखती है।” शमशेर ख़ान ने अरसलान को दिलासा दिया।
“हां, अल्लाह ने मुझसे एक हाथ से ले के दोनो हाथों से लौटाया है। मुझे तो यहां जितना अपनापन मिला है, उसकी उम्मीद नहीं थी।” अरसलान ने जवाब दिया।
“यह हुई ना बात, शाबाश।” शमशेर ख़ान ने माहौल को बदला। तभी शरफू कॉफी ले के आ गया।
कहानी जारी है, अगले सफ़े पे