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साया और मोहब्बत : एक अनसुलझी पहेली

रमेश, रागिनी और एक रहस्यमयी हवेली की कहानी, जहाँ मोहब्बत, साया और डर एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। पढ़िए एक अनसुलझी रहस्यमयी दास्तान।

पुरानी हवेली के सामने रमेश और रहस्यमयी रागिनी की डरावनी कहानी

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा

रमेश और बिरजू सकते में आ जाते हैं कि तभी अचानक वो अपने दिलनशीन अंदाज में कहती है, “अरे डरिए नहीं! मैं रागिनी इस हवेली की मालकिन हूं। मेरे पति गांव से बाहर रहते हैं और मैं अकेली यहां इतनी बड़ी हवेली में रहती हूं। वैसे यहां जल्दी कोई आता जाता नहीं, आप लोग यहां कैसे? कहीं आप मुसाफिर तो नहीं?”

रमेश थोड़ा हिचकिचाते हुए कहता है – “जी हां मैडम हम मुसाफिर ही हैं, हम शहर से आए हैं”।

रागिनी कुछ सोचते हुए अपने ख्यालों में डूबते हुए कहती है, “अक्सर यहां पर मुसाफिर आते हैं और फिर चले भी जाते हैं”। वो रमेश की तरफ मुखातिब होते हुए कहती है – “लेकिन आप मुझे मुसाफिर नहीं लग रहे। पता नहीं क्यों लेकिन आपका चेहरा मुझे कुछ जाना पहचाना सा लग रहा है”।

रागिनी के ऐसे अजीब बर्ताव से रमेश थोड़ा हिचकिचाहट महसूस करता है और अचानक से रागिनी से कहता है, “नहीं मेरा नाम रमेश है और मैं एक ढोल बजाने वाला हूं। इस गांव में मैं पहली बार आया हूं। हमें दूसरे गांव जाना है शादी में ढोल बजाने। हम इस हवेली के बाहर से गुज़र रहे थे तो अचानक से मुझे इस हवेली से आती हुई चीखें सुनाई दीं, तो मैं बस देखने चला आया कि वो किसकी चीखें हैं”।

इतने में रागिनी अपने होश-व-हवास खोते हुए गुस्से में कहती है, “मेरी ही चीखें थीं वो, मेरी मेरी मेरी… फिर रागिनी खुद को संभालते हुए कहती है, “अरे वो मैं सो रही थी न, तो मैंने एक बुरा सपना देखा, तो बस मेरी चीखें निकल गईं।”

रमेश और बिरजू को रागिनी कुछ अजीब लगती है, इसलिए वो दोनों रागिनी से कहते हैं कि अब हम दोनों को चलना चाहिए।

रागिनी उनकी हां में हां मिलाते हुए कहती है – “ठीक है”। लेकिन पता नहीं क्यों उसकी आंखें रमेश को छोड़ने का नाम ही नहीं ले रही थीं। रागिनी रमेश को गौर से देखती चली जाती है।

रमेश को रागिनी के इरादे कुछ ठीक नहीं लगते। वो रागिनी से पीछा छुड़ाकर किसी तरह हवेली से बाहर निकल आता है।

रमेश और बिरजू शादी में ढोल बजाने के लिए जंगल की तरफ निकल जाते हैं। रमेश हवेली से बाहर तो आ जाता है, लेकिन अभी भी रमेश के मन में रागिनी की तस्वीर बार बार नजर आ रही थी। जैसे रागिनी उसे बार बार अपनी तरफ खींच रही हो।

साया और मोहब्बत : रागिनी … एक रहस्य!

रमेश और बिरजू अपनी मंज़िल की तरफ चलते चला जाते हैं, लेकिन उनका रास्ता खत्म होने का नाम ही नहीं लेता। वो दोनों उस ठिकाने पर पहुंच ही नहीं पा रहे थे, जहां का उन्हें पता दिया गया था। इस तरह चलते चलते रात हो जाती है। चारों तरफ काला अंधेरा और जंगल ही जंगल दिखाई देता है। आखिर में थक कर रमेश और बिरजू एक बरगद के पेड़ के नीचे बैठ जाते हैं।

उन्हें बहुत भूख लगती है तो वो अपना टिफिन निकाल कर खाना खाने लगते हैं। खाना खाने के बाद जैसे ही वो थोड़ा आराम करने के लिए बैठते हैं, तो रमेश को रागिनी की आवाज़ें सुनाई देती हैं।

कहानी जारी है, अगले सफ़े पे