तेरी उल्फत में | मेरा नाम कशिश है!..इन्तिक़ाम की एक शाम! | क़िस्त 02
“और लो अरसलान, कुछ खाओगे नहीं तो कमज़ोरी कैसे दूर होगी तुम्हारी।” रूबी ने अरसलान की प्लेट में बिरयानी डालते हुए कहा। “अरे आपा क्या आज ही सब खिला देंगी आप। कितना तो खा चुका हूं। आपा मैं तो आता ही रहता हूं आपके घर। फिर कभी खा लूंगा। ले देके आपके अलावा मैं जाता […]

कहानी गहरी है, हर सफ़ा आपके दिल में उतर जायेगा
“और लो अरसलान, कुछ खाओगे नहीं तो कमज़ोरी कैसे दूर होगी तुम्हारी।” रूबी ने अरसलान की प्लेट में बिरयानी डालते हुए कहा।
“अरे आपा क्या आज ही सब खिला देंगी आप। कितना तो खा चुका हूं। आपा मैं तो आता ही रहता हूं आपके घर। फिर कभी खा लूंगा। ले देके आपके अलावा मैं जाता ही कहां हूं।”
राज बोला “हां हम सब तो तेरे लिए गैर है न बेटा, हमारे घर कहां आएगा तू। जब तेरे को बोलो घर आने को तो कोई न कोई काम निकल आता है तेरा।”
“नहीं यार ऐसा नहीं है। अब जब तू कहेगा तब मैं तेरे साथ चलूंगा।” अरसलान बोला।
“हां अब बारी-बारी सबके घर आना है तेरे को। अब कोई भी बहाना नहीं चलेगा। जब देखो तकल्लुफ करता रहता है।” हिना बोली।
रोहित बोला “रूबी आपा, यह बताइए आज आप हमसे रेफ्यूजियों की तरह क्यों पेश आ रही हैं? मुझ मासूम को एक बार भी नहीं पूछा आपने।”
रूबी ने हंसते हुए बोला “हां भाई आप क्या लेंगे बताइए?”
रोहित बोला “आप ज़्यादा मेहनत न करिए बस मुझे वह बिरयानी की डिश दे दीजिए। बाकी मैं खुद देख लूंगा।”
सब ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे।
तब शमशेर खान बोले “अरसलान कभी हमारे घर भी आओ, बेटा। हम भी तो आपके अपने ही हैं।”
फिर शमशेर खान कशिश से बोले “अरे भाई, अपने क्लास फेलो को कभी बुलाओगी कि नहीं अपने घर। यह इस शहर में अकेला रहता है। अगर कभी आएगा हमारे घर तो इसका भी दिल बहल जाएगा, और हमें भी खुशी होगी।”
कशिश ने अरसलान को घूरते हुए कहा “जी कभी आइए न हमारे घर भी। थोड़ी खिदमत का मौका हमें भी तो दीजिए।”
अरसलान ने जवाब दिया “जी और कितनी खिदमत करेंगी आप। पहले ही आप हमारी काफ़ी खिदमत कर चुकी हैं। वैसे आऊंगा जल्द ही। आप लोगों की मोहब्बत को मैं टाल नहीं सकता।”
थोड़ी देर बाद सब खाना खा के फारिग हुए तो सब बाहर लॉन में आ गए। अरसलान एक तरफ खड़ा था। तभी कशिश उसके पास में आ कर खड़ी हो गई। उसने एक जहरीली मुस्कान के साथ अरसलान से कहा “खाना खाया सही से कि नहीं।”
अरसलान ने कहा “जी अल्लाह का शुक्र है।”
कशिश ने कहा “खा लो जी भर के, तुमको तो अभी बहुत कुछ झेलना है। तुमको काफ़ी ताक़त की ज़रूरत पड़ेगी।” यह कह कर वह जाने लगी। तभी अरसलान ने उसकी कलाई पकड़ कर उसे झटके से रोका।
अरसलान बोला “यह जो तुम शान और गुरूर से सर उठा के चल रही हो, उस गुरूर को मैं एक लम्हे में तोड़ सकता हूं। मुझे सिर्फ शमशेर साहब को तुम्हारी करतूत बतानी पड़ेगी। उसके बाद का अंजाम क्या होगा यह तुम खुद सोच सकती हो। पर मैं उनकी बहुत इज़्ज़त करता हूं। और न ही मैं तुम्हारी ज़िल्लत चाहता हूँ। इसलिए कूड़ा का शुक्र ऐडा करो की मैं चुप हूं।”
कशिश ने हाथ छुड़ाते हुए कहा “हमारी इज़्ज़त की तुम्हें इतनी फ़िक्र किस लिए है?”
कहानी जारी है, अगले सफ़े पे